टीवी न्यूज चैनल वालों ने पत्रकारिता का बेड़ागर्क किया

टीवी न्यूज चैनल वालों ने पत्रकारिता का जिस तरह से बेड़ागर्क किया है उसी का परिणाम है कि शाहीन बाग में जनाब के साथ जनता


टीवी न्यूज चैनल वालों ने पत्रकारिता का जिस तरह से बेड़ागर्क किया है उसी का परिणाम है कि शाहीन बाग में जनाब के साथ जनता ने दुर्व्यवहार किया। हालांकि जनता को ऐसा नहीं करना चाहिए था, लेकिन हर किसी के धैर्य की एक सीमा होती है। मीडिया का असली काम है जनता की आवाज को सत्ता तक पहुंचाना, लेकिन जब मीडिया सत्ता के साथ और जनता के विरोध में खड़ा हो जाय तो जनता भी क्या करे? कैसे संयम रखे, धैर्य रखे? और कैसे बर्दाश्त करे, उसे जो हर रोज, हर पल, उसी के खिलाफ जहर उगल रहा है। जहर भी एक हद तक ही निगला जा सकता है। हर कोई भोले शंकर नहीं हो सकता कि जहर कंठ में धारण कर नीलकंठ बन जाय।
दरअसल, एक समय था कि अफवाहें मौखिक रूप से फैलाई जाती थीं। अब वही काम मीडिया करने लगा है। आजादी के बाद लंबे समय तक जो विपक्ष में रहे वह अब सत्ता में हैं। विपक्ष में रहते हुए इन लोगों ने अपनी अफवाहों, विरोधों की वजह से सत्ता पक्ष को काम नहीं करने दिया। काम मे बाधा डालने के लिए गाय तक लेकर संसद तक पहुंच गए। सरकारी कर्मचारियों को सरकार का आदेश नहीं मानने का आह्वान किया। पुलिस और सेना तक को भड़काया। इसी का नतीजा थी 1975 में इमरजेंसी। उस समय की सत्ता यदि आज की तरह असंवेदनशील होती तो आज देश, समाज और सत्ता की तस्वीर कुछ और होती। उस समय बहुत ही शातिर तरीके से दक्षिणपंथी लोग जनपक्ष के नाम पर सत्ता का विरोध करते रहे। बोफोर्स जैसे तथाकथित घोटाले महज सरकार को बदनाम करने और सत्ता हासिल करने की कवायद भर ही थे। वैसे ही जैसे कि 2जी का तथाकथित घोटाला। लोकपाल और कदाचार के नाम पर अन्ना का आंदोलन। इन मुखौटों के पीछे कौन था आज जनता समझ गयी है। ऐसे लोगों ने जिन तिकड़मों से सत्ता हासिल की उन्हें अपनी ही साजिशें हर जगह लागू होती नजर आ रही हैं। वे अपनी धार्मिक कट्टरता के इतने वश में हो गए हैं कि उनका विवेक खो गया है। एक समुदाय विशेष से नफरत के बल पर वह असीमित समय तक सत्ता पर काबिज रहना चाहते हैं। उनका एक सूत्री एजेंडा नफरत फैलाना और हिंसा को शह देना है ताकि सत्ता की डोर टूट न जाय। उनके वैचारिक पूर्वजों ने आजादी के बाद से यही किया है। अब वे उस फसल को काट रहे हैं। लेकिन कबीरदास ने सही ही कहा है कि अति की भली न बोलना, अति की भली न चूप... संस्कृत में भी कहा गया है कि अति सर्वथा: वर्जेय.. कहने का मतलब कि हर किसी की एक सीमा होती है। हद होती है। उसके बाद तो कोई न कोई परिणाम ही सामने आता है। जनता भी अब समझने लगी है। कई जनविरोधी फैसलों पर वह खामोश रही, लेकिन अब जब उसकी ही पहचान पर बन आयी है तो उसे मैदान में आना ही पड़ा। वह आ ही गयी है। अब आप कपड़ों से पहचानिए या बोली-भाषा से। क्षेत्र से या विशेष से, जनता अपनी बात कहेगी। ऐसे में जनता की बात को सत्ता तक पहुंचाने वाला माध्यम मीडिया यदि अपना काम नहीं करेगा तो जनता उसे भी नकार देगी। यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि जनता ही उपभोक्ता है और आप उत्पाद बन गए हैं। उपभोक्ता घटिया उत्पाद को इस्तेमाल करने के बाद छोड़ देता है। मीडिया के लिए बहुत जरूरी होता है जनता का भरोसा। उसका विश्वास। यदि यही खो दिया तो मीडिया के अस्तित्व पर ही संकट शुरू हो जाता है। सत्ता के भक्तिकाल में मीडया की विश्वनीयता पर सवाल खड़ा हो गया है। यदि ऐसा नहीं होता तो जनता किसी मीडिया कर्मी के साथ बदसलूकी नहीं करती। जी हां, मीडियाकर्मी। जब आप पत्रकार ही नहीं रहे तो आपका सम्मान भी कहां रहा? आपका सम्मान न तो सत्ता कर रही है न ही जनता। इस स्थिति के लिए आप खुद जिम्मेदार हैं। मुट्ठी भर पेड ट्रोल आर्मी के सहारे आप जनता को नहीं नकार सकते। जनता परजीवी कीड़ों को पहचानने लगी है। उसका चश्मा उतरने लगा है। उसकी आत्मा जागने लगी है। तालू से चिपकी उसकी जुबान बोलने लगी है। बेहतर होगा कि आप भी पाला बदल लें। इस्तेमाल होने से बचें। नहीं तो आगाज से अंजाम की कल्पना कर सकते हैं।
अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई सत्ता और जनता के बीच थी। सत्ता संगीनों के बल पर दमन कर रही थी और निहत्थी जनता आवाज बुलंद कर रही थी। जेल जा रही थी जान भी दे रही थी। बेशक उस समय भी अधिकतर खामोश थे। कुछ अनजान थे तो कुछ सत्ता के मुखबिर थे। लेकिन आजादी के मतवालों पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा। अंग्रेजों को भारत छोड़ना ही पड़ा। जब भी कोई सत्ता जनता का इम्तहान लेती है जनता फेल नहीं होती...

 

 

ओमप्रकाश तिवारी के फेसबुक वाल से 

 

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