संतान प्राप्ति, संतान रक्षा एवं संतान उन्नति व्रत अचला सप्तमी

वैसे तो माघ का सम्पूर्ण महीना ही पुण्य मास के नाम से जाना जाता है, लेकिन माघ महीने में कृष्ण पक्ष की अमावस्या, शुक्ल पक्ष की सप्तमी और

 

-अशोक “प्रवृद्ध”

 


वैसे तो माघ का सम्पूर्ण महीना ही पुण्य मास के नाम से जाना जाता है, लेकिन माघ महीने में कृष्ण पक्ष की अमावस्या, शुक्ल पक्ष की सप्तमी और पूर्णिमा तिथि का अत्यंत महत्व है। माघ शुक्ल सप्तमी को वर्ष भर की सभी सप्तमी में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अचला सप्तमी के नाम से जानी जाने वाली इस व्रत को करने से सौभाग्य प्राप्त होता है।पौराणिक मान्यतानुसार प्रत्येक वर्ष माघ महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि‍ को अचला सप्तमी का पर्व मनाया जाता है। इस अचला सप्तमी को सूर्य सप्तमी, रथ सप्तमी, आरोग्य सप्तमी, सूर्यरथ सप्तमी, पुत्र सप्तमी, अर्क सप्तमी, महती सप्तमी, सप्त सप्तमी आदि नामों से भी जाना जाता है । यह सप्तमी अगर रविवार को पड़ती है, तो इसे भानु सप्तमी भी कहा जाता है। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, भगवान सूर्य के द्वारा इसी दिन सम्पूर्ण जगत को अपने प्रकाश से आलोकित किया गया था, इसीलिए इस सप्तमी को सूर्य जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। सात जन्म के पाप को दूर करने हेतु रथारूढ़ सूर्यनारायण की पूजा रथ सप्तमी के दिन किया जाता है। पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठर को इस व्रत के बारे में बताया था। माघ शुक्ल सप्तमी के दिन ही सूर्य ने अपने प्रकाश रूपी किरण से जगत को प्रकाशित किया था और इसी दिन भगवान सूर्यदेव सात घोड़ों के रथ पर सवार हो कर लोक में प्रकट हुए थे जो आपके समक्ष विराजमान होकर निरंतर जीवन प्रदान कर रहे हैं। कुछ स्थानों पर संतान सप्तमी व्रत भारतीय पंचांग के अनुसार के अनुसार भाद्रपद के शुक्ल पक्ष सप्तमी को सन्तान प्राप्ति और बच्चों के साथ जुड़े सभी चिंताओं को दूर करने के लिए मनाया जाता है । स्वस्थ बच्चे पैदा करने की इच्छा रखने वाले विवाहित जोड़े इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती की प्रार्थना करते हैं। यह व्रत पुरुषों और महिलाओं दोनों के द्वारा किया जाता है।भविष्य पुराण के अनुसार सूर्यदेव को अपना दिव्य रूप माघ शुक्ल सप्तमी तिथि को ही मिला और संतानें भी इसी तिथि को प्राप्त हुई, अत: सप्तमी तिथि भगवान सूर्य को अतिशय प्रिय है।

 


 

सूर्य से सम्बन्धित कथाएं, उनके व्रत , उपासना की विधियाँ व महत्व आदि के सम्बन्ध में विस्तृत विवरणी विविध पुराणों में अंकित हैं ।माघ शुक्ल सप्तमी व्रत की कथा के सम्बन्ध में पूछे जाने पर श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि किसी समय मथुरा में लोमश ऋषि के पधारने पर मेरे माता-पिता अर्थात देवकी - वसुदेव ने भक्तिपूर्वक उनकी सेवा की तो लोमश ऋषि ने उन्हें कंस द्वारा मारे गए पुत्रों के शोक से उबरने के लिए संतान सप्तमी का व्रत करने की सलाह देते हुए उन्हें व्रत का पूजन-विधान बताकर व्रतकथा भी बताई। संतान सप्तमी व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार अयोध्यापुरी के प्रतापी राजा नहुष की पत्नी का नाम चंद्रमुखी था। उनके राज्य में ही विष्णुदत्त नामक एक ब्राह्मण भी अपनी पत्नी रूपवती के साथ रहता था। रानी चंद्रमुखी तथा रूपवती में परस्पर घनिष्ठ प्रेम था। एक दिन वे दोनों सरयू में स्नान करने गईं, तो उन्होंने देका कि वहां अन्य स्त्रियां भी स्नान कर रही थीं। उन स्त्रियों ने वहीं पर शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक उनका पूजन किया। रानी चंद्रमुखी तथा रूपवती को इसे देखकर आश्चर्य हुआ और उन्होंने उन स्त्रियों से इस व्रत के विधि-विधान के बारे में पूछा। उन स्त्रियों ने बताया कि यह व्रत संतान देने वाला है और इसे सन्तान सप्तमी कहते हैं । उस व्रत की कथा व महता को सुनकर उन दोनों सखियों ने भी जीवन-पर्यंत इस व्रत को करने का संकल्प कर शिव के नाम का डोरा बांध लिया। किंतु घर पहुंचने पर वे संकल्प को भूल गईं। फलतः मृत्यु के पश्चात रानी वानरी तथा ब्राह्मणी मुर्गी की योनि में पैदा हुईं। कालांतर में दोनों पशु योनि छोड़कर पुनः मनुष्य योनि को प्राप्त हुईं। चंद्रमुखी मथुरा के राजा पृथ्वीनाथ की रानी बनी तथा रूपवती ने फिर एक ब्राह्मण के घर जन्म लिया। इस जन्म में रानी का नाम ईश्वरी तथा ब्राह्मणी का नाम भूषणा था।

भूषणा का विवाह राजपुरोहित अग्निमुखी के साथ हुआ। इस जन्म में भी उन दोनों में बड़ा प्रेम हो गया। व्रत भूलने के कारण ही रानी इस जन्म में संतान सुख से वंचित रही। भूषणा ने व्रत को याद रखा था, इसलिएउसके गर्भ से आठ पुत्रों ने जन्म लिया। रानी ईश्वरी के पुत्र शोक की संवेदना के लिए एक दिन भूषणा उससे मिलने गई। उसे देखते ही रानी के मन में ईर्ष्या पैदा हो गई और उसने उसके बच्चों को मारने का प्रयास किया किंतु बालक न मर सके। उसने भूषणा को बुलाकर सारी बात बताई और फिर क्षमायाचना करके उससे पूछा कि किस कारण तुम्हारे बच्चे नहीं मर पाए। भूषणा ने उसे पूर्वजन्म की बात स्मरण कराई और कहा कि उसी के प्रभाव से आप मेरे पुत्रों को चाहकर भी न मरवा सकीं। यह सब सुनकर रानी ईश्वरी ने भी विधिपूर्वक संतान सुख देने वाला यह मुक्ताभरण व्रत रखा। तब व्रत के प्रभाव से रानी पुनः गर्भवती हुई और एक सुंदर बालक को जन्म दिया। उसी समय से पुत्र-प्राप्ति और संतान की रक्षा के लिए यह व्रत प्रचलित है।माघ सप्तमी से सम्बद्ध एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार एक वेश्या ने अपनी जिंदगी में कभी कोई दान-पुण्य का कार्य नहीं किया था। उसे जब अपने अंतिम क्षणों का ध्यान आया, तो वह वशिष्ठ मुनि के पास गई और मुनि से अपनी मुक्ति का उपाय पूछा। वशिष्ठ ने बताया कि माघ मास की सप्तमी अचला सप्तमी है। इस दिन सूर्य का ध्यान करके स्नान करने और सूरज को दीप दान करने पुण्य प्राप्त होता है।वेश्या ने मुनि के बताए अनुसार माघ सप्तमी का व्रत किया, जिससे उसे मृत्युलोक से जाने के बाद इन्द्र की अप्सराओं में शामिल होने का गौरव मिला।

 

 

 

पौराणिक ग्रन्थों में सूर्य को आरोग्यदायक कहा गया है और इनकी उपासना से रोग मुक्ति का उपाय बताया जाता है ।माघ मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी से संबंधित कथा का उल्लेख पौराणिक ग्रन्थों में मिलता है। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब को अपने शारीरिक बल और सौष्ठव पर बहुत अधिक अभिमान हो गया था। अपने इसी अभिमान के मद में उन्होंने दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया और शाम्ब की धृष्ठता को देखकर उन्हों ने शाम्ब को कुष्ठ होने का श्राप दे दिया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने शाम्ब को सूर्य भगवान की उपासना करने के लिए कहा। शाम्ब ने आज्ञा मानकर सूर्य भगवान की आराधना करनी आरम्भ कर दी जिसके फलस्वरूप उन्हें अपने कष्ट से मुक्ति प्राप्त हो सकी। इसलिए इस सप्तमी के दिन सूर्य भगवान की आराधना विधिवत तरीके से करने वाले श्रद्धालुओं को आरोग्य, पुत्र और धन की प्राप्ति होती है। सूर्य को प्राचीन ग्रंथों में आरोग्यकारक माना गया है, इस दिन श्रद्धालुओं द्वारा भगवान सूर्य का व्रत रखा जाता है ।इस सप्तमी को सूर्य देव की उपासना तथा व्रत करने वाले व्यक्तियों के सभी रोग ठीक हो जाते हैं। वर्तमान में भी सूर्य चिकित्सा का उपयोग आयुर्वेदिक और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में किया जाता है। मान्यता है कि शारिरिक कमजोरी, हड्डियों की कमजोरी या जोडो़ में दर्द जैसी परेशानियों में भगवान सूर्य की आराधना करने से रोग से मुक्ति मिलने की संभावना बनती है । सूर्य की ओर मुख करके सूर्य स्तुति करने से शारीरिक चर्मरोग आदि नष्ट हो जाते हैं। पुत्र प्राप्ति के लिए भी इस व्रत का महत्व माना गया है । इस व्रत को श्रद्धा तथा विश्वास से रखने पर पिता-पुत्र में प्रेम बना रहता है।
 

 

 

माघ शुक्ल सप्तमी को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में नियमपूर्वक स्नान करने से मनावांछित फल की प्राप्ति होती है। इस तिथि‍ को पूर्व दिशा की ओर मुंह करके सूर्योदय की लालिमा के वक्त ही स्नान कर लेना चाहिए। माघ शुक्ल सप्तमी में प्रयाग में संगम स्नान करने से विशेष लाभ मिलता है। इस अवसर पर स्नान और अर्घ्यदान करने से आयु, आरोग्य व संपत्ति की प्राप्ति‍ होती है। मान्यता है कि माघ शुक्ल सप्तमी को सुबह किसी पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करके दीपदान करने से उत्तम फल मिलता है। सूर्य भगवान की पूजा करके एक ही वक्त मीठा भोजन या फलाहार करना चाहिए। इस दिन भोजन में नमक का त्याग करने से सूर्य भगवान प्रसन्न होते हैं।पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार.संतान सप्तमी एक दिव्य व्रत है और इसके पालन से विविध कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं । .संतान सप्तमी का व्रत माघ मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी को किया जाता है । यह सप्तमी पुराणों में रथ, सूर्य, भानु, अर्क, महती, आरोग्य, पुत्र, सप्तसप्तमी आदि अनेक नामों से प्रसिद्ध है और अनेक पुराणों में उन नामों के अनुरूप व्रत की अलग-अलग विधियों का उल्लेख है । यह व्रत पुत्र प्राप्ति, पुत्र रक्षा तथा पुत्र अभ्युदय के लिए किया जाता है ।इस व्रत का विधान दोपहर तक रहता है । इस दिन जाम्बवती के साथ श्यामसुंदर तथा उनके बच्चे साम्ब की पूजा की जाती है । माताएं पार्वती का पूजन करके पुत्र प्राप्ति तथा उसके अभ्युदय का वरदान मांगती है । इस व्रत का मुक्ताभरण भी करते हैं । इस व्रत को रखने के लिए प्रातः स्नानादि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र पहन दोपहर को चौक पूर कर चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, सुपारी तथा नारियल आदि से शिव -पार्वती की पूजा करना चाहिए । इस दिन नैवेद्य भोग के लिए खीर-पूरी तथा गुड़ के पुए रखना उत्तम होता है । रक्षा के लिए शिवजी को डोरा भी अर्पित कर इस डोरे को भगवान शिव के वरदान के रूप में लेकर उसे धारण करके व्रतकथा सुनने का विधान है ।


 

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राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस