'शिकारा' कर रही दर्शकों का शिकार, अमीर भी प्रभावित, एक सच्ची कहानी

विधु विनोद चोपड़ा को फिल्म 'शिकारा (Shikara)' रिलीज हो गई। 'शिकारा' में 1990 की घाटी से कश्मीरी पंडितों की अनकही कहानी को उजागर किया गया है

 

नई दिल्ली: 

विधु विनोद चोपड़ा को फिल्म 'शिकारा (Shikara)' रिलीज हो गई। 'शिकारा' में 1990 की घाटी से कश्मीरी पंडितों की अनकही कहानी को उजागर किया गया है जिसे जगती और अन्य शिविरों के 40,000 असली प्रवासियों के साथ शूट किया गया है। यहीं नहीं, फिल्म में माइग्रेशन की वास्तविक फुटेज भी शामिल की गई है।

आज से करीब 30 साल पहले, 19 जनवरी 1990 को हजारों कश्मीरी पंडितों को आतंक का शिकार होकर अपना घर छोड़ना पड़ा था। उन्हें उम्मीद थी कि वे जल्दी ही अपने घरों में दुबारा से उसी तरह रह पाएंगे, जैसे दशकों से रहते आए थे। उन्हें उम्मीद थी कि उनके लिए संसद में शोर मचेगा, लेकिन उनके पक्ष में कहीं से कोई आवाज नहीं उठी। तब से लेकर अब तक 30 साल बीत गए, आज भी वे अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं। कई कश्मीरी पंडित अपने घर में फिर से रहने की आस अपने सीने में दबाए दुनिया से विदा भी हो गए।

निर्माता-निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘शिकारा’ इसी कथ्य के आसपास रख कर बुनी गई फिल्म है। हालांकि उन्होंने घाटी में आतंक की खेती और उसके परिणामस्वरूप कश्मीरी पंडितों पर हुए वीभत्स अत्याचारों को फिल्म में बस संदर्भ के रूप में रखा है और इसे एक कश्मीरी पंडित जोड़े की प्रेम कहानी के रूप में ज्यादा प्रस्तुत किया है। कहानी शुरू होती है 1987 में, जब कश्मीर घाटी कश्मीरी पंडितों की भी उतनी ही थी, जितनी कश्मीरी मुसलमानों की। जब दोनों समुदाय पूरे सौहाद्र्र के साथ मिल-जुल कर रहते थे। फिल्म खत्म होती है 2018 में, जब हजारों कश्मीरी पंडित अभी भी शरणार्थी का जीवन जीने को अभिशप्त हैं।

आमिर खान भी इस फिल्म से प्रभावित हैं। उन्होंने ट्वीट किया और पूरी टीम को शुभकामनाएं दीं।

  आमिर खान (Aamir Khan) ने अपने ट्विटर एकाउंट पर विधु विनोद चोपड़ा सहित पूरी टीम को शुभकामनाएं देते हुए लिखा,"आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं विनोद! शिकारा हमारे हाल के इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक है. एक ऐसी कहानी जो बताई जानी चाहिए."

 

 

क्या है कहानी

यह फिल्म मुख्य रूप से शिव और शांति की प्रेम कहानी है। निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने घाटी में आतंकवाद और कश्मीरी पंडितों की त्रासदी को सिर्फ संदर्भ के रूप में प्रयोग किया है। उसकी थोड़ी-सी झलक दिखलाई है। वह भी फिल्म के पूर्वाद्ऱध में ही। मध्यांतर के बाद फिल्म पूरी तरह शिव और शांति की प्रेम कहानी पर फोकस करती है। विधु अपनी बात प्रतीकों में ज्यादा कहते हैं। लेखक राहुल पंडिता, अभिजात जोशी और विधु घाटी में आतंकवाद के कारणों की ज्यादा चर्चा नहीं करते। ज्यादा सवाल नहीं उठाते, बस प्रेम पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इसीलिए फिल्म में कश्मीरी पंडितों के घर जलने के जो दृश्य है, उसमें निर्देशक उपद्रवियों के चेहरे दिखाने की बजाय उनकी परछाइयों को दिखलाते हैं। वे बस यह समझाने की कोशिश करते हैं कि सरकारी दमन और अमेरिका कश्मीर में आतंकवाद के पीछे मुख्य वजह हैं। इसीलिए फिल्म का नायक अमेरिका के राष्ट्रपति को चिट्ठियां लिखता है, भारत के हुक्मरानों को नहीं।

लेकिन इस फिल्म की प्रेम कहानी बहुत सशक्त है। वह अंदर तक भिगोती है। प्रेम की शक्ति में भरोसा पैदा करती है। शिव और शांति का प्रेम जिंदगी के सबसे कठिन लम्हों में भी कम नहीं होता। वह प्रेम ही है, जो उनके जीवन को कड़वा होने से बचाता है और अपने पीड़कों के प्रति भी कड़वा होने से बचाता है। रंगराजन रामभद्रन की सिनेमेटोग्राफी शानदार है। वह अपने कैमरे से कश्मीर की नैसर्गिक खूबसूरती, वहां के जनजीवन और फिल्म के मूड को बेहतरीन तरीके से पेश करते हैं

 

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