‘नागरिक सत्याग्रह पदयात्रा’ पर निकले पत्रकार समेत 10 को पुलिस ने किया गिरफ्तार

सीएए और एनआरसी के प्रदर्शनों से घबराई सरकार अब किसी भी प्रदर्शन को लेकर कार्रवाई से नहीं चूक रही है। गाजीपुर से खबर आ रही है कि दस लोगों की टोली

 

 

गाजीपुर।

सीएए और एनआरसी के प्रदर्शनों से घबराई सरकार अब किसी भी प्रदर्शन को लेकर कार्रवाई से नहीं चूक रही है। गाजीपुर से खबर आ रही है कि दस लोगों की टोली जो गोरखपुर से राजघाट दिल्ली ‘नागरिक सत्याग्रह पदयात्रा’ पर निकली थी को गाजीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया है। इसमें एक दिल्ली की पत्रकार भी शामिल हैं जो अपने फेसबुक पेज पर प्रतिदिन की यात्रा का उल्लेख जरूर करती हैं। प्रदीपिका सारस्वत उस टीम का हिस्सा हैं जो गोरखपुर से दिल्ली पैदल यात्रा कर रही है।

 

 

पुलिस सूत्रों का कहना है कि ये लोग बिना इजाजत के पैदल यात्रा पर निकले थे, इसलिए इन्हें गाजीपुर में गिरफ्तार किया गया। हालांकि टीम का कहना है कि वे समाज में सद्भाव बढ़ाने के लिए ‘नागरिक सत्याग्रह पदयात्रा’ कर रहे हैं।

पुलिस ने युवाओं पर धारा 151 के तहत कार्रवाई की है, लेकिन ये नहीं बताया है कि इनकी यात्रा से क्या दिक्कत हो रही थी।

प्रदीपिका ने 10 फरवरी को फेसबुक पर लिखा था- 'कल शाम से लोकल इंटेलीजेंस और पुलिस यात्रियों के चक्कर काट रही है, तस्वीरें खींच रही है, वीडियो उतार रही हैं। राज्य इतना डरा हुआ है कि चंद लोगों को शांति और सौहार्द की बात करते हुए नहीं देख पा रहा है। यह यात्रा एक पाठशाला है, जहां महज पैदल चलते हुए हम सीखते हैं कि कोई जगह कश्मीर कैसे बनती है।'

जेल भेजे गए लोगों में मनीष शर्मा, प्रियेश पांडे, नीरज राय, अनंत शुक्ल, मुरारी, राज अभिषेक, शेष नारायण ओझा शामिल हैं। मुरारी और प्रियेश बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के एमए के छात्र हैं। प्रदीपिका ने यात्रा के बारे में एक लेख में कहा था- 'उत्तर प्रदेश में सीएए-एनआरसी के प्रदर्शनों के दौरान कुल 23 मौतें हुई थीं। इस मुद्दे को लेकर कुछ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने फैक्ट-फाइंडिंग टीम बनाई थी। हिंसक घटनाओं के बारे में जानने के बाद युवाओं ने पदयात्रा करने का फैसला किया।' वह अपने फेसबुक पर लिखती है कि ...

पाँचवे दिन हम जियानपुर, बाग़ ख़ालिस से निकल चुके हैं। क़स्बे के बाहर निकलते हुए आज़मगढ़ की तरफ़ सड़क के दाएँ एक गाँव की ओर जाते रास्ते के मुहाने पर एक बोर्ड लगा है। उस पर प्रदेश के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री की तस्वीरें हैं। बीच में मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा है सौभाग्य। एक ऐसा शब्द जो भारतीयों को लुभाने, भरमाने में बहुत कामयाब हो सकता है, ख़ास तौर पर महिलाओं के संदर्भ में। शायद किसी योजना के बारे में है। पर दूर से पढ़ नहीं पाती।

बाईं तरफ़ एक लड़की है जिसे मैं यात्रा का संदेश पत्र देना चाहती हूँ। गोद में बच्चा लिए १५-१६ साल की लड़की कहती है कि उसे पढ़ना नहीं आता। उसका कमज़ोर शरीर और वैसी ही भंगिमाएँ उसके सौभाग्य की चुग़ली करती हैं। ‘सौभाग्य’ योजना के प्रचार में लगा पैसा और उसे लागू करने के नाम पर पैसे वालों की जेब में गया पैसा उस सौभाग्य पर हँसता है। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री अपनी मूर्तिवत भंगिमाओं के साथ बोर्ड पर मुस्तैद रहते हैं। उनका सौभाग्य बहुत सों के दुर्भाग्य पर खड़ा है।

यात्रा का दूसरा दिन

सवेरे आठ बजे गाँवों के बच्चे, स्कूल जाते, न जाते। प्लास्टिक की थैलियों में बिकने वाली चीज़ें ख़रीद कर खाते नज़र आ रहे हैं। कुछ लोग सवेरे से सड़कों के किनारे बैठ कर ताश खेल रहे हैं। कुछ बच्चे कंचे खेल रहे हैं।सड़क के किनारे के कुछ घरों में रोटियाँ बन चुकी हैं। बकरियों के सामने घास डाल दी गयी है।

बहुएँ नहा धो कर तुलसी को जल अर्पित करती दिखती हैं जबकि बाक़ी औरतें, मर्द बच्चे आग के आस-पास बैठे हैं।

सड़क पर खड़े दो बुज़ुर्ग समझते हैं कि मैं हिंदी नहीं बूझती, कि मैं विदेशी हूँ। बड़ी देर तक वो मुझे कहने के लिए शब्द तलाशते हैं, इशारों के ज़रिए अपनी बात कहने की कोशिश करते हैं। वो मुझे अपने परिवार की तस्वीरें उतारने के लिए कहते हैं। एक लड़की पूछती है कि इन तस्वीरों का क्या होगा। वह दूर साइकिल पर खड़ी है, कहीं जाने को तैयार।मैं उसे पास आने को कहती हूँ पर वह चाहती है कि मैं वहीं से उसे जवाब दूँ। वह चली जाती है। मैं भी।

पास के घर में दो शरारती बच्चे गाने लगते हैं, ‘दिल दिया है जान भी देंगे…”

आगे चल रहा एक साथी दूसरे को प्रदेश की जाति आधरित राजनीति का इतिहास समझा रहा है।

हम नेकवार गाँव की तरफ़ निकल पड़े हैं, कच्चे बंधनुमा रास्ते पर। कल रात हमें यहीं ठहरना था। पर व्यवस्था न हो सकने के कारण ऐसा हो न सका। पर आज सुबह साथी लड़कों के लिए नहाने धोने की व्यवस्था यहीं होनी है, नदी किनारे बंजारी माता के मंदिर के क़रीब एक टूटी-फूटी धर्मशाला में। मैं समूह की अकेली महिला सदस्य हूँ। मैं पिछले होस्ट के घर पर ही स्नान कर के निकली हूँ। गीले कपड़े और तौलिया ज़रूर मैंने यहीं मंदिर के समीप एक सूखे पेड़ पर फैला दिया है।

सामने नदी बह रही है। गुर्रा नाम है इसका। शायद बाढ़ के दिनों में बहुत गुर्राती है, इसलिए। नदी के तट पर बैठ मैं इस मंदिर की कहानी के बारे में सोच रही हूँ। बंजारी माता का नाम ही इतना दिलचस्प है। सामने कच्चे घाट पर कुछ कपड़े, औरतों की धोतियाँ उतरी पड़ी हैं। दो औरतें, सास-बहू, कोई कर्मकांड कर घाट से लौट रही हैं। इनकी पूरबही भाषा मुझे ठीक-ठीक समझ नहीं पड़ती।

जहाँ बैठी हूँ, उसके बाँयी तरफ़ छोटे-छोटे मंदिर नुमा थान बने हुए हैं। यहाँ दाह किए गए पुरखों के स्मारक। रंग-बिरंगे।मैं तस्वीर नहीं उतारती। सूरज ठीक उनके पीछे है न।

एक साथी को उनके राजनीतिक दल से फ़ोन आता है। वे समझने को तैयार नहीं है कि कोई यात्रा सिर्फ़ सौहार्द के लिए कैसे हो सकती है। फ़ोन के उस तरफ़ से बताया जाता है कि जसवंत सिंह सौ गाड़ियाँ लेकर यात्रा कर रहे हैं, कोई ख़बर तक नहीं बनी। साथी हँसते हैं। हम देखते हैं की सत्ता केंद्रों के के इर्द-गिर्द के लोग सिर्फ़ निजी फ़ायदे और ख़बर में बने रहने के बारे में सोच रहे हैं। जनता के हृदय तक पहुँचना उनके लिए मुद्दा नहीं है। वे आरोप लगाते हैं कि यह यात्रा पार्टी के संसाधन इस्तेमाल करते हुए की जा रही है। जबकि ऐसा नहीं है।

मंदिर के पुजारी मंदिर की कहानी नहीं जानते। बा बताते हैं कि बहुत पुरानी हैं। “जब यहाँ शेर, बाघ रहते रहल, तनाव हैं। अंग्रेज़ ज़माना था तनाव।” पड़ोस के लक्ष्मीपुर के बैजनठ मुझे धर्मशाला में बैठे एक दो बूढ़ों से मिलाते हैं। एक पोपला बूढ़ा बताता है कि ये मंदिर १०० से भी ज़्यादा पहले थारू या थरूहत बंजारों ने बसाया था। ये लोग जंगल-जंगल घूमते थे। जब यहाँ जनसंख्या बढ़ गई तो वे आगे चले गए। अब कोई नहीं जनता वे कहाँ होंगे।

वे मुझे कुछ दूरी पर बना कुआँ दिखाते हैं, ये उन्हीं थरुहटों का बनाया है। अब बाढ़ के कारण पूरा कुआँ मिट्टी से भर चुका है, पर जगत की चौकोर ईंटें उसकी प्राचीनता का साक्ष्य देती हैं।

बैजनाथ कहते हैं कि हमें चौरी चौरा में तरकुला देवी के मंदिर जाना चाहिए था। वो हमें तरकुला के भक्त बंधु सिंह की कहानी सुनाते हैं। बंधू सिंह अंग्रेज़ों को पकड़कर उनकी बली देवी को चढ़ाया करते थे। एक बार जब अंग्रेज़ों ने उन्हें पकड़ लिया तो उन्हें फाँसी दी गई। देवी की कृपा से उनकी गांधी की रस्सी छह बार टूटी। सातवीं बार उन्होंने देवी से कहा कि अब वो उन्हें जाने देन। सातवीं बार जब उन्हें फाँसी मिल गई तो मंदिर में तरकुल का पेड़ का सर टूट गया और उस से ख़ून निकला। देस इन कहानियों से भरा पड़ा है।

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राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस

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