भारतीय जीवन बीमा निगम का जीवन ही संकट में!

लगभग 64 साल पुराने भारतीय जीवन बीमा निगम अर्थात एलआईसी ऑफ इंडिया का जीवन अब संकट में दिख रहा है।

 

(लिमटी खरे)

 

लगभग 64 साल पुराने भारतीय जीवन बीमा निगम अर्थात एलआईसी ऑफ इंडिया का जीवन अब संकट में दिख रहा है। भारत सरकार के नियंत्रण वाले जीवन बीमा निगम की अपनी कुछ हिस्सेदारी को बेचने की बात कही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के द्वारा यह बात सदन में कही गई है। उनका तर्क है कि सरकारी कंपनियों के विनिवेश को लेकर चल रही कवायद का यह हिस्सा है। केंद्र सरकार भले ही आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होने का दावा करे पर जिस तरह से सरकार के द्वारा एक के बाद एक सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने की कवायद की जा रही है, उससे सरकार की मंशा पर सवालिया निशान लगते दिख रहे हैं। सरकार का मानना हो सकता है कि कारोबार या व्यापार करना सरकार का काम नहीं है, पर सरकारी उपक्रमों का जब गठन किया गया था तब यह भावना कहीं न कहीं इसके मूल में शामिल थी। सरकार के द्वारा भारत पेट्रोलियम, शिपिंग कार्पोरेशन, आईटीडीसी, एयर इंडिया, हवाई अड्डों, बंदरगाहों, कंटेनर कार्पोरेशन आदि को एक के बाद एक कर बेचा ही जा रहा है।

 

भारतीय जनता पार्टी नीत केद्र सरकार के कार्यकाल में सरकारी नवरत्न कंपनियों की डगमगाती आर्थिक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। एक के बाद एक सरकारी उपक्रम तालाबंदी की कगार पर पहुंचते जा रहे हैं। हाल ही में दूरसंचार के अधिकांश कर्मचारियों के द्वारा स्वेच्छिक सेवानिवृति अर्थात वीआरएस ले लिया है। भारत संचार निगम लिमिटेड में अगर कर्मचारी नहीं होंगे तो जाहिर है कि सेवाओं पर इसका असर पड़ेगा और उपभोक्ता निजि सेवा प्रदाताओं की ओर आकर्षित होते चले जाएंगे।

वैसे देखा जाए तो एलआईसी और अन्य सरकारी उपक्रमों में जमीन आसमान का अंतर है। बाकी उपक्रमों के बारे में यह कहा जाए कि उसकी दखल देश के हर परिवार तक नहीं है तो अतिश्योक्ति नहीं होगा, पर जहां तक भारतीय जीवनव बीमा निगम की बात है तो कमोबेश हर परिवार तक इसकी सीधी पहुंच है। हर दूसरे परिवार में एक न एक व्यक्ति बीमित होगा और वह कहीं न कहीं एलआईसी पर भरोसा करता दिखता है। लोगों का भरोसा आज भी दीगर निजि क्षेत्र की बीमा कंपनियों के बजाए एलआईसी पर ज्यादा ही दिखता है, इसका कारण यह है कि लोगों को यह बात भली भांति पता है कि एलआईसी पूरी तरह स्वदेशी कंपनी है। लोग अपने जीवन की सुरक्षा के लिए एलआईसी पर आंख बंद कर भरोसा करते हैं। देश में बीमा कारोबार को अगर देखा जाए तो कुल बीमा कारोबार में एलआईसी की भागीदारी 76 फीसदी से ज्यादा है।

लगभग साढ़े छः दशकों में एलआईसी ने देश के लोगों के मन में जमकर विश्वास पैदा किया है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस बात का उदहारण इससे मिलता है कि नब्बे के दशक के बाद देश में आईं दीगर बीमा कंपनियों के तरह तरह के प्रलोभन भी एलआईसी के तिलिस्म और एकाधिकार को समाप्त नहीं किया जा सका है।

केंद्र सरकार के द्वारा जिन सार्वजनिक उपक्रमों में अपनी भागीदारी को बेचा जा रहा है उसमें सरकार की हिस्सेदारी काफी कम ही मानी जा सकती है। इस तरह की कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध भी हैं। सरकार के अलावा दीगर आम लोगों के पास भी इन कंपनीज के शेयर हैं, पर एलआईसी के बारे में कम ही लोग जानते होंगे कि भारतीय जीवन बीमा निगम को शेयर बाजार में सूचीबद्ध नहीं किया गया है।

लगता है सरकार को सलाह देने वाले पर्दे के पीछे खड़े लोगों के द्वारा एलआईसी की स्थापना के दौरान इसके मूल में क्या था इस बात से नीति निर्धारकों से छिपाया गया है। 1956 में जब एलआईसी की स्थापना की गई थी, उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के द्वारा एलआईसी को दीगर सरकारी उपक्रमों से अलग ही स्थान दिया गया था। इसकी स्थापना के लिए संसद में एक विशेष तरह के कानून को बनाया जाकर की गई थी। इसकी स्थापना के वक्त यह बात भी सामने आई थी कि लोगों का भरोसा इसके लिए जगाने के लिए सरकार की भूमिका भी इसमें तय की गई थी। उस दौरान बनाए गए कानून के अनुसार एलआईसी के द्वारा जिसका भी बीमा किया जाएगा, बीमित व्यक्ति को जिस तरह का लाभ दिए जाने का आश्वासन एलआईसी के द्वारा दिया जाएगा, उसके पार्श्व में सरकार के द्वारा गारंटी दी गई थी। इसका तातपर्य यही है कि अगर एलआईसी के द्वारा बीमित व्यक्ति को उसे बताए गए लाभ से वंचित रखा जाता है तो सरकार का यह दायित्व होगा कि वह बीमित व्यक्ति को वह लाभ किसी भी कीमत पर मुहैया करवाए। यही कारण है कि साढ़े छः दशकों बाद भी एलआईसी का जलजला और विश्वास आज भी लोगों के बीच कायम है। सरकार अगर इसमें हिस्सेदारी बेचकर आईपीओ लाती है तो सरकार को इसके पहले कानून में संशोधन करना होगा। अगर ऐसा हुआ तो एलआईसी भी आम बीमा कंपनियों की तरह ही हो जाएगी और यह एलआईसी के ताबूत में आखिरी कील के मानिंद ही साबित होने वाला आत्मघाती कदम होगा।

जानकारों का कहना है कि सरकार को एलआईसी की हिस्सेदारी बेचे जाने की राह में अनेकानेक रोढ़े हैं। सबसे पहले तो इसे शेयर बाजार में सूचीबद्ध करना होगा। इसके बाद इसकी संपत्तियों, निवेश, पालिसी धारक से लिए गए पैसे को कहां रखा जाता है या उसका निवेश कहां किया जाता है! जैसी बातों को सार्वजनिक करना होगा। यह भी माना जा रहा है कि एलआईसी पर देनदारियों का बोझ बढ़ता ही जा रहा है जिसके कारण सरकार को पिछले दरवाजे का यह फैसला लेना मजबूरी बन चुका है।

बजट भाषण के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के द्वारा दिए गए संकेतों के बाद अब भारतीय जीवन बीमा निगम की हिस्सेदारी बेचे जाने की बात फिजा में तैरती दिख रही है। सरकार शायद इस बात से आश्वसस्त है कि इस मामले में विरोध के स्वर ज्यादा प्रस्फुटित नहीं हो पाएंगे। अगर सरकार यह सोच रही है तो सरकार निश्चित रूप से मुगालते में ही मानी जा सकती है। सरकार के द्वारा हिस्सेदारी बेचे जाने के संकेत दिए जाने के बाद से ही अब इसका विरोध भी होता दिख रहा है।

विपक्ष में बैठे सियासी दल एलआईसी को बचाने के लिए तलवारें पजाते दिख रहे हैं तो कर्मचारी संगठनों ने भी लंगोट कसना आरंभ कर दिया है। इन दोनों स्तर पर विरोध की चिंगारी कब शोला बन जाएगी यह नहीं कहा जा सकता है। चूंकि यह मामला आम लोगों से जुड़ा हुआ है इसलिए आम लोगों के रोष और असंतोष की हवा जब विपक्षी दलों और कर्मचारी संगठनों के विरोध को मिलेगी तब सरकार को इसे संभालना शायद मंहगा पड़ सकता है। देश भर में लाखों या यूं कहें कि करोड़ों की तादाद में एलआईसी एजेंट्स हैं। इनके सामने भी रोजी रोटी का संकट खड़ा होने की दलील विपक्षी दलों और कर्मचारी संगठनों के द्वारा अगर दी गई तो विरोध में उमड़े सैलाब को थामना सरकार के लिए टेड़ी खीर ही साबित हो सकता है।

भारतीय जीवन बीमा निगम के प्रतीक चिन्ह को अगर देखा जाए तो चिन्ह में एक दीपक को दो हाथों से सुरक्षा प्रदान की जाती दिखती है। एलआईसी की पंच लाईन भी योगक्षेमं बहाम्यम है जिसका अर्थ है कुशलता और सुरक्षा के दायित्व का सफलता से वहन किया जाना। यह पंचलाईन भगवत गीता के एक श्लोक से लिया गया है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर विपक्षी दलों के द्वारा सरकार के इस फैसले का विरोध किया जाना चाहिए, ताकि घरों घर तक आसान पैठ बना चुके भारतीय जीवन बीमा निगम लिमिटेड की तालाबंदी की ओर बढ़ते कदमों को थामा जा सके और इससे जुड़े लाखों करोड़ों परिवारों के सामने उतपन्न होने वाले रोजी रोटी के संकट की संभावनाओं पर विराम भी लगाया जा सके। अभी यह बात सतही तौर पर आई है, इसलिए इसको सुधारा जा सकता है। इस संबंध में सरकार के द्वारा विधेयक लोकसभा और राज्य सभा में लाए जाने के बाद राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। उनकी अनुमति के उपरांत यह कानून बन जाएगा, इसलिए अभी जरूरत है, इस मामले में पहल कर इसमें सुधार करवाने की! (लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

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राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस

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