प्रशांत किशोर (पीके) की फैक्ट्री में तैयार हो रही है बिहारी डिश

प्रशांत किशोर यानी पीके यानी चुनावी रणनीतिकार की फैक्ट्री में बिहार के लिए विशेष डिश तैयार हो रही है। इस डिश में जहां राजनीति का तड़का होगा वहीं

 

राजेश राय, नई दिल्ली।

प्रशांत किशोर यानी पीके यानी चुनावी रणनीतिकार की फैक्ट्री में बिहार के लिए विशेष डिश तैयार हो रही है। इस डिश में जहां राजनीति का तड़का होगा वहीं बिहार विधानसभा चुनाव के लिए जातीय और सामाजिक ताने बाने के साथ बिहार के  लिए नए सपने होंगे। हालांकि पीके उन सपनों को पंख दे पाएंगे कि नहीं यह तो समय बताएगा पर इतना तो तय है कि बिहार की राजनीति में नए आगाज और चाणक्य की इंट्री हो गई है जो न केवल वहां की राजनीति को मथेगा बल्कि राजनीति के कील कांटे को भी दुरुस्त करेगा।

  

 

आज आगाज

Prashant kishor ने मंगलवार को पटना में अपने राजनीतिक भविष्य का खाका खींचा। प्रशांत किशोर ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जमकर घेरा और कहा कि नीतीश सरकार हर मोर्चे पर फेल है। जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) से निकाले जाने के बाद प्रशांत किशोर के अगले कदम का इंतज़ार लंबे समय से हो रहा था। पहले 11 को वो ऐलान करने वाले थे। बाद में इसे 18 फरवरी कर दिया। मतलब उस मंगलवार के बदले इस मंगलवार का शुभ दिन उन्हें मुफीद लगा। मंगलवार को ही दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के साथ उनकी तस्वीर सामने आई थी। उस दिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी की बड़ी जीत हुई थी।

लेकिन प्रशांत किशोर ने जो खाका रखा उसमें कोई ज्यादा दम नजर नहीं आ रहा है। पीके ने कहा कि चुनाव नहीं लड़ेंगे। नेता चुनाव लड़ने से परहेज करे तो समझिए बुनियादी दिक्कत है। उन्होंने अपनी संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी का जिक्र कर बताया कि लाखों युवा उनसे जुड़े हुए हैं। प्रशांत किशोर ने कहा कि वो 'बात बिहार की' कार्यक्रम के जरिए पंचायत कर पहुंचेंगे। जिस दिन एक करोड़ बिहारी युवा कनेक्ट हो गए उस दिन बताएंगे कि राजनीतिक पार्टी लॉंच की जाए या नहीं। मतलब कनफ्यूजन पूरा है।

प्रशांत किशोर को शायद नहीं मालूम की अमित शाह की अगुआई में बीजेपी का संगठन हर बूथ पर पन्ना प्रमुख साल भर पहले बना चुका है। बिहार में बीजेपी के 90 लाख तो सिर्फ प्राथमिक सदस्य हैं। अगर बूथ लेवल तक पहुंच को काउंट करें तो संख्या कहीं अधिक हो जाएगी। इसलिए जिस बुनियाद का सपना संजोकर पीके बिहार की राजनीति के महारथियों से लोहा लेने उतरे हैं, उसके बारे में खुद भी आश्वस्त नहीं हैं।

प्रशांत किशोर ने सामाजिक और आर्थिक सूचकांक गिनाए। हर मोर्चे पर नीतीश कुमार को फेल बताया। उनका कहना था, "लड़कियों को फ्री साइकल मिल गई, लेकिन शिक्षा बर्बाद हो गई, बिजली पहुंच गई, लेकिन प्रति व्यक्ति आय नहीं बढ़ी। लालू के 15 साल के नाम पर राज करते रहे नीतीश लेकिन बेहतरी के लिए कुछ नहीं किया।" हालांकि प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लिए पीके क्या करेंगे ये बताना भूल गए। उनकी प्राथमिक शिक्षा नीति क्या होगी ये भी बताना भूल गए। कुल मिलाकर पीके वही काम कर रहे थे जिसे तेजस्वी यादव ठीक से नहीं कर पा रहे हैं।

वैचारिक धरातल पर भी नीतीश को तेजस्वी स्टाइल में ही कोसते नजर आए। कल तक ऐसा लग रहा था कि पीके किसी ठोस कार्यक्रम के साथ मैदान में ताल ठोकेंगे। ऐसा कुछ भी नहीं था। गांधी-गोडसे का जिक्र कर वो फंस गए। दरअसल वो एक ही साथ नरेंद्र मोदी, अमित शाह और नीतीश कुमार तीनों को कोसने बैठे थे। पर किसी पत्रकार ने याद दिला दिया कि वो पिछले पांच साल में सभी के साथ काम कर चुके हैं।

 

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