सर्व मंगलमय कल्याणकारी आदिमहादेव शिव (महाशिवरात्रि पर विशेष)

यद्यपि भारत के समस्त भागों में विष्णु के अवतार के रूप में श्रीराम और श्रीकृष्ण के मंदिर मिलते हैं फिर भी श्रीराम और कृष्ण की पूजा सर्वदेशीय न होकर

 

-अशोक “प्रवृद्ध”

 

यद्यपि भारत के समस्त भागों में विष्णु के अवतार के रूप में श्रीराम और श्रीकृष्ण के मंदिर मिलते हैं फिर भी श्रीराम और कृष्ण की पूजा सर्वदेशीय न होकर कुछ अंचलों तक ही सीमित है , ठीक इसके विपरीत विभिन्न देवताओं में सर्वोपरि देवाधिदेव महादेव शिव की पूजा आज भारत में सर्वत्र सर्वव्यापक रूप में होती है । उत्तर में कैलाश मानसरोवर से लेकर दक्षिण में श्रीलंका और पश्चिम में द्वारिका से लेकर पूर्व में मणिपुर तक अनेक स्थानों में न जाने कितने ही रूपों में शिव- शिवा की उपासना- अराधना होती है , यह कहना संभव नहीं है। यहाँ तक कि योगीजनों - तपस्वियों - मनष्वियों ने भी इन्हें अपने अंतःकरण ह्रदय में देखा तथा शिवोऽहं कहकर परमानन्द प्राप्त करने में सफलता पाई । भोगियों ने शिव में भोग पाया और साधकों ने गुरु पाए। देव,असुर, यक्ष, किन्नर , नाग, पुरूष-स्त्री, महर्षि, शूद्र, धनी-निर्धन सबने समान श्रद्धा से इनकी आराधना की। सम्प्रति गाँव-नगर, शहर-क़स्बा सर्वत्र लोगों के शिव की स्तुति एवं प्रशंसा में गाये गीत से महाशिवरात्रि आदि शुभ अवसरों पर सारा भारत शिवमय हो उठता है।

शिव शब्द की व्युत्पति ‘शिवु कल्याणे’ धातु से ‘शिव’शब्द सिद्ध होता है। सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम सम्मुल्लास में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कहा है कि ‘बहुलमेतन्निदर्शनम्।’इससे शिवु धातु माना जाता है, जो कल्याणस्वरूप और कल्याण का करनेहारा है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम ‘शिव’है।

वेदों में ईश्वर के स्वरुप की कल्पना की गई है, जिसकी पराकाष्ठा पुरूष सूक्त में है । वेदों में जहाँ-तहाँ ईश्वर की विभूति के रूप में विभिन्न नामधारी देवताओं के स्वरूप का वर्णन है।शिव वेद-शास्त्र वर्णित देवता हैं।वेदों में इनका उल्लेख रूद्र के रूप में किया गया है।‘रुदिर् अश्रुविमोचने’ इस धातु से ‘णिच्’प्रत्यय होने से ‘रुद्र’शब्द सिद्ध होता है। निरुक्त में रूद्र शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए यास्काचार्य कहते हैं- ‘यो रोदयत्यन्यायकारिणो जनान् स रुद्रः’जो दुष्ट कर्म करनेहारों को रुलाता है, इससे परमेश्वर का नाम ‘रुद्र’है।

यजुर्वेद के ब्राह्मण का वचन है-

यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति, यद्वाचा वदति तत् कर्मणा करोति

यत् कर्मणा करोति तदभिसम्पद्यते।। - यजुर्वेद
 

अर्थात -जीव जिस का मन से ध्यान करता उस को वाणी से बोलता, जिस को वाणी से बोलता उस को कर्म से करता, जिस को कर्म से करता उसी को प्राप्त होता है। इस से क्या सिद्ध हुआ कि जो जीव जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है। जब दुष्ट कर्म करनेवाले जीव ईश्वर की न्यायरूपी व्यवस्था से दुःखरूप फल पाते, तब रोते हैं और इसी प्रकार ईश्वर उन को रुलाता है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘रुद्र’ है।

वेदों में कहे ‘त्रयस्त्रिशत्त्रिंशताः’ तैंतीस देव हैं की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण में करते हुए कहा गया है कि द्वादश आदित्य, एकादश रूद्र, अष्ट वसु, इन्द्र तथा प्रजापति ये तैंतीस देव हैं । प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म्म, कृकल, देवदत, धनञ्जय और जीवात्मा ये ग्यारह रूद्र इसलिए कहाते हैं कि जब शरीर को छोड़ते हैं तब रोदन कराने वाले होते हैं ।शुक्ल यजुर्वेद के सोलहवें अध्याय में शतरूद्रिय सूक्त अंकित है जिसमें रूद्र के विभिन्न नाम आये हैं । जिनमें नीलग्रीव, गिरित्र, गिरीश, गिरिचर, गिरिशम, पशुपति, शम्भु और शंकर प्रमुख हैं । इसी सूक्त 16/51 में मृगचर्म पहने तथा त्रिशूल धारण किए शिव का वर्णन अंकित है-

मीढुष्टाम शिवतम शिवोनःसुमना भव ।               

परमेवृक्ष ऽआयुधं निधाय कृतिं वसानऽ आचपिनाकं विभ्रदागहि ।।

अर्थात – हे अत्यंत पराक्रमयुक्त, अतिकल्याणकारी, सेना के पति आप हमारे लिए प्रसन्नचित से सुखकारी हों । खड्ग,भृशुण्डी और शतघ्नी आदि शस्त्रों का ग्रहण कर मृगचर्मादि की अंगरखी को शरीर को पहिने आत्मा के रक्षक धनुष व  बख्तर आदि धारण किये हुए हमलोगों की रक्षा के लिए आइए ।

 

ऋग्वेद के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि रूद्र माध्यम श्रेणी के देवता हैं । ऋग्वेद में उनका वर्णन भयंकर देवता के रूप में अंकित है। देवता तक रूद्र से डरते हैं । रूद्र स्तुति से स्पष्ट होता है कि रूद्र के प्राचीन भयावह वाणों का डर स्तोत्रकर्ता के मन में है, अतः वह अनेकानेक प्रशंसासूचक उपाधियों से रूद्र को प्रसन्न करता है ।लेकिन यजुर्वेद में रूद्र महान देवता के रूप में अंकित हैं ।वेदों में वर्णित रूद्र ब्राह्मण ग्रंथों में एक प्रमुख देवता के रूप में अंकित हैं, जिनका अपना वास्तविक व्यक्तित्व था । वे वैदिक ऋत के मूर्तिमान स्वरुप बन गए जबकि अन्य देवता सर्वशक्तिमान यज्ञ विधि के समक्ष गौण होते चले गए । इस भांति रूद्र का पद निश्चितरूपेण अन्य देवताओं में ऊँचा हो गया तथा वे वास्तव में देवों के देव महादेव हो गए । वैदिक धर्म के दो मान्य अंग थे- ईशस्तुति अथवा स्वाध्याय और यज्ञ। अतः वैदिक आर्य अग्नि में घी,यव आदि का हवन कर प्रभु को सर्वव्यापक समझते हुए उनकी किसी विभूति की स्तुति एवं प्रार्थना किया करते थे। लेकिन जब आर्यों एवं अनार्यों में सम्मिश्रण हुआ तब उनके देवता का वैदिक रूद्र के साथ आत्मसात हुआ और उसके उपासक रूद्र के उपासक माने जाने लगे। जब अनार्यों के देवता का वैदिक रूद्र के साथ आत्मसात हुआ तब लिंगोपासना रूद्र की उपासना में समाविष्ट हो गई ।इसके साथ स्वयं आर्यों की उर्वरता सम्बंधी विधियाँ थीं तथा रूद्र भी उर्वरता के देवता थे ।

शतपथ ब्राह्मण 6/1/3/1-8 में रूद्र जन्म की कथा अंकित है, किन्तु कहीं भी उनकी मूर्ति की स्थापना एवं पूजा का उल्लेख नहीं हुआ है ।हालाँकि दशोपनिषद ब्रह्मपरक हैं और उनमें देवी-देवताओं का उल्लेख नहीं है, फिर भी वृहदारण्यक 1/4/11, 2/2/2 और प्रश्नोपनिषद2/6 में रूद्र का प्रसंग उल्लेख है ।वृहदारण्यक 1/4/11 के अनुसार प्रारंभ में एक ब्रह्म था । वह विभुतियुक्त कर्म करने के लिए समर्थ नहीं हुआ, क्योंकि उस समय वह अकेला था । उसने कल्याणस्वरुप  क्षत्रिय जाति को उत्पन्न किया एवं देवताओं में क्षत्रिय इन्द्र, वरुण, सोम, रूद्र, मेघ, यम, मृत्यु और ईशानादि को उत्पन्न किया । वृहदारण्यक 2/2/2 के अनुसार, सात रूद्रादि देवता नेत्र स्थित प्राण की रक्षा करते हैं, जिनमें जो ये नेत्र में लाल रेखाएँ हैं, उनके द्वारा रूद्र इस माध्यम प्राण के अनुगत हैं । प्रश्नोपनिषद 2/6 में उपनिषदकार कहता है, हे प्राण ! अपने तेज से तू इन्द्र है । अपने रक्षण से तू रूद्र है ।

 

रूद्र का सम्बन्ध तमोगुण से किया गया है । मैत्रायणी उपनिषद् के चौथे प्रपाठक 4/5 में ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र को परमात्मा का सबसे बड़ा और श्रेष्ठ शरीर कहा गया है । किन्तु इन तीनों को परमात्मा का पर्यायवाची कहकर ब्रह्मा , रूद्र और विष्णु को क्रमशः परमात्मा का रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण का अंश कहा गया है ।इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि तीनों मिलकर पूर्ण परमात्मा का स्वरुप हैं ।मैत्रायणी उपनिषद् के हीअंत 5/8 में शम्भु, भव, रूद्र, प्रजापति, विश्वस्रष्टा (ब्रह्मा), हिरण्यगर्भ, सत्य, प्राण, हंस, विष्णु, नारायण, अर्क, सविता, धाता, सम्राट, इन्द्र और चन्द्र- सबको नियन्ता और प्रजापति कहा है ।जो इस अग्नि के रोप में तपता है और हजारों के नेत्र रूप में प्रकाशमय आनंद से व्याप्त है, वही जानने योग्य है ।श्वेताश्वेतर उपनिषद् में सर्वप्रथम महेश्वर, शिव, ईशान आदि नाम से रूद्र संबोधित किये गए हैं ।वेदों में रूद्र का उग्र देवताओं के रूप में परिचय मिलता है, लेकिन श्वेताश्वेत्तर उपनिषद् में सिर्फ एक श्लोक 3/6 में ही उनकी प्राचीन उग्रता का परिचय मिलता है। श्वेताश्वेत्तर उपनिषद 3/6 में कहा है, हे गिरिशंत ! जीवों की ओर फेंकने के लिए तुम अपने हाथ में जो वाणधारण किये हुए रहते हो।यहीं वे मोक्षान्वेषी योगियों के ध्यान के विषय हो जाते हैं, और उनको स्त्रष्टा ब्रह्म, परमात्मा माना गया है । रूद्र की स्तुति में अंकित पुरूष सूक्त के भी कुछ मन्त्र इस उपनिषद् में 3/14-16 में अंकित हैं । इस उपनिषद् में रूद्र के  साथ पूर्णरूपेण से ब्रह्म का तादात्म्य किया गया है। श्वेताश्वेत्तर उपनिषद 3/14 में प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि, ‘हे रूद्र ! तुम कुपित होकर हमारे पुत्र, पुत्र, आयु, गौ और अश्वों का कषय न करना और हमारे वीर सेवकों का वध न करना । हम हव्य सामग्री से युक्त होकर सर्वदा ही तुम्हारा आह्वान करते हैं ।‘

श्वेताश्वेत्तरोपनिषद दशोपनिषद से बाद की और रूद्रहृदयोपनिषद (शैव उपनिषदों) के पहले की रचना है । श्वेताश्वेत्तरोपनिषद में अंकित रूद्र के स्वरुप से रूद्र के उत्कर्ष का पता चलता है । इसके साथ ही रूद्र जनसाधारण के देवता ही नहीं, अपितु आर्यों क्व सबसे अधिक आराध्य देव बन गये । श्वेताश्वेत्तर उपनिषद् में रूद्र की योगी, चिन्तक और शिक्षक रूप में कल्पना की गई है ।इसमें पहली बार रूद्र का विश्व की सक्रिय सर्जना शक्ति के रूप में उल्लेख अंकित हैतथा उसको परब्रह्म की शक्ति कहा गया है । श्वेताश्वेतर उपनिषद् 4/2 में रूद्र के बारे में कहा गया है, ‘वही अग्नि है, वही सूर्य है, वही वायु है, वही चन्द्रमा है, वही शुक्ल (शुद्ध) है, वही ब्रह्म है, वही जेता है और वही प्रजापति है ।‘ श्वेताश्वेतर उपनिषद् 3/11 के अनुसार, ‘वह भगवान समस्त मुखों वाला, समस्त शिरों वाला और समस्त ग्रीवाओं वाला है । वह सम्पूर्ण जीवों के अन्तःकरणों में स्थित और सर्वव्यापी है, इसलिए सर्वगत और मंगलमय है ।‘ श्वेताश्वेतर उपनिषद् 3/9 में रूद्रके बारे में कहा गया है,‘जिससे उत्कृष्ट कोई नहीं है तथा जिससे छोटा और बड़ा भी कोई नहीं है, वह यह अद्वितीय परमात्मा अपनी द्योत्नात्मक  महिमा में वृक्ष के समान निश्छल भाव से स्थित है । उस पुरूष ने ही इस सम्पूर्ण जगत को व्याप्त कर रखा है ।

श्वेताश्वेतर उपनिषद् 3/2  के अनुसार, ‘क्योंकि एक ही रूद्र है , इसलिए (ब्रह्मविद) उससे भिन्न किसी अन्य वस्तु की अपेक्षा नहीं करते ।वह अपनी (ब्रह्मादि) शक्तियों द्वारा इन लोकों का शासन करता है । वह समस्त जीवों के भीतर स्थित है और सम्पूर्ण लोकों की रचना कर उनका रक्षक होकर प्रलय काल में उन्हें संकुचित करता है ।‘ श्वेताश्वेतर उपनिषद्  में ही पहली बार शिव को परब्रह्म माना गया है तथा इसी में सांख्य एवं सांख्य प्रकृति का पहली बार निश्चित रूप से उल्लेख भी हुआ है ।श्वेताश्वेतर उपनिषद्6/12 में कहा गया है कि ‘जो नित्यों में नित्य, चेतनों में चेतन अकेला है । बहुतों को भोग प्रदान करता है, सांख्य योग द्वारा ज्ञातव्य उस सर्वकारण देव को जानकार पुरूष समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है ।‘

 

श्वेताश्वेत्तर में रूद्र के निराकार रूप का वर्णन अंकित है लेकिन उसमें रूद्र की मूर्तिपूजा का उल्लेख नहीं है ।  सुतरां वृहदारण्यक प्रश्न, मैत्रायणी, केन एवं श्वेताश्वेत्तर उपनिषद् में रूद्र संबंधी विवरणी अंकित है । रामायण में उत्तर काण्ड में एक अनार्य रावण के द्वारा शिव मूर्ति पूजा करने का विवरण अंकित करते हुए कहा गया है कि राक्षसराज रावण जहाँ-जहाँ जाता है, अपने साथ सुवर्णमय लिंग ले जाता है।एक अन्य स्थान पर वाल्मीकि रामायण में ही अंकित है कि बालू की वेदी पर रावण ने शिवलिंग की स्थापना की । वाल्मीकि रामायण 123/20-21 में लंका से विमान द्वारा घर लौटते समय राम ने एक स्थान दिखलाते हुए सीता से कहा कि वहाँ उन्होंने महादेव की कृपा से समुद्र ने पुल बाँधा । इसी स्थान पर प्रभु महादेव हम पर प्रसन्न हुए थे। तीनों लोकों में पूरित सेतुबंध तीर्थ इसी का नाम है । यह स्थान महा पवित्र तथा महापातकों का नाश करने वाला है ।

महाभारत में अंकित है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश – इन तीनों देवताओं पर जगत के तीन काम क्रमशः उत्पति , पालन, संहार नियत हैं। इन तीनों का एकीकरण परब्रह्म ने किया गया है । इसमें शिव संबंधी पाशुपत मत का विस्तृत विवरणांकित है। महाभारत वनपर्व 39-40 में अर्जुन का शिव के साथ साक्षात् दर्शन, युद्ध तथा स्तुति का वर्णन अंकित है। महाभारत शांतिपर्व 284/15-60 में अंकित है कि दक्ष के शरणागत होने पर हवनकुंड से साक्षात् प्रकट होकर उनपर कृपा की।284/182-191 में अंकित है कि इस पर दक्ष ने सहस्त्रनाम द्वारा स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर वरदान देने के बाद शिव अंतर्ध्यान हो गये ।महाभारत सौप्तिक पर्व के सत्रहवें अध्याय कुपित होकर शिव द्वारा अपने लिंग को काटने की कथा आई है। अनुशासन पर्व अध्याय चौदह में कहा गया है कि इस प्रकार भूमि पर डाला गया वह लिंग अग्नि रूप में प्रतिष्ठित हो गया। वैदिक वांग्मय के साथ श्रौतसूत्रों, पुराणों में रूद्र अनेक देवताओं में से एक देवता हैं। इन ग्रंथों में उनके अनेक पुराने नामों रूद्र, भव, शर्व आदि का तो उल्लेख तो हुआ ही है महादेव, पशुपति, भूतपति आदि नामों का भी उल्लेख है। रूद्र की सहचरी देवता का भी उल्लेख भी है। पुराणादि ग्रंथों में तो उनके उपरोक्त नामों के अतिरिक्त शंकर, शिव, स्वयंभू, महादेव , काल आदि नामों से अंकित करते हुए  देवाधिदेव महादेव शिव की तथा शिवलिंग की उपासना- अराधना, पूजा-अर्चना, नाम, जप, स्मरण की महिमा तथा उनसे सम्बंधित विविध पौराणिक कथाओं का वर्णन अंकित है ।

जनसत्ता एक्सप्रेस एक स्वतंत्र मंच है। जहां आपको अपनी बात रखने की, अपने विचार रखने की, अपने जज्बात रखने की खुली छूट है। पर एक बात यहां साफ कर दें कि पत्रकारिता के भी कुछ मूलभूल सिद्धांत हैं जिससे परे हम लोग भी नहीं। पर आप जनसत्ता एक्सप्रेस के साथ किसी भी रूप में जुड़ना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। हम या आपको उतना ही आदर देंगे, सम्मान देंगे जितना अपने सहकर्मी को। इसलिए आप अपने क्षेत्र की खबरें, वीडियो हमें शेयर करें। हम उन्हें जनसत्ता एक्सप्रेस पर प्रकाशित करेंगे। इसके लिए आप jansattaexp@gmail.com का उपयोग कर सकते हैं। या फिर हमें आप whatsup भी 7678313774 पर कर सकते हैं। फोन तो आप कर ही सकते हैं। इसलिए एक नेक काम के लिए, पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए हमारे साथ, हमारी टीम का हिस्सा बनिए और स्वतंत्र पत्रकार, फोटोग्राफर, स्तंभकार के रूप में अपने अंदर के पत्रकार को जिंदा रखिए। हमारी टीम तो आपके साथ है ही।

राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस