‘अल्लाह तेरे एक को, इतना बड़ा मकान’

प्रयागराज। प्राचीन समय में कबीरदास ने अपने दोहों के माध्यम से समाज की कुरुतियों पर करारा प्रहार किया, उनके दोहे पढ़कर लोग व्याकुल हो जाते थे, कई बार दोहों की वजह से समाज में सुधार भी


प्रयागराज। प्राचीन समय में कबीरदास ने अपने दोहों के माध्यम से समाज की कुरुतियों पर करारा प्रहार किया, उनके दोहे पढ़कर लोग व्याकुल हो जाते थे, कई बार दोहों की वजह से समाज में सुधार भी हुए। साथ ही उस समय के शासकों को उनके दोहों से परेशानी होती थी, जिसकी वजह से कबीर को प्रताड़ित भी किया करते थे। आज के समय में हमारे हिन्दी साहित्य की प्राचीन विधा है, जिसे पाठ्यक्रम में भी पढ़ाया जाता है। यह बात प्रभाशंकर शर्मा ने गुफ़्तगू की ओर से रविवार को करैली स्थित अदब घर आयोजित दोहा दिवस समारोह में बतौर मुख्य वक्ता कही।

उन्होंने कहा कि पांचवीं सदी में दोहा सृजन की शुरूआत हुई है, इसका वर्तमान छंद 13-11 मात्राओं का है, लेकिन प्राचीन काल में 12-14 और 14-16 के शिल्प में भी दोहे कहे जाते थे। प्रयाग के कवि मलूकदास का दोहा ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम/दास मलूका कह गए, सबके दाता राम’ पूरी दुनिया में बहुत ही प्रचलित है।

उर्दू शायर निदा फ़ाज़ली के दोहे भी खूब पढ़े, सुने जाते हैं, उनका यह दोहा बेहद प्रासंगिक है- बच्चा मस्जिद देखकर बोला आलीशान/अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान’। कवि बिहारी, रहीम आदि भी दोहा के बड़े कवि हुए हैं।


गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि दोहा अब हिन्दी में ही नहीं बल्कि उर्दू में भी खूब लिखा, पढ़ा जा रहा है, पाकिस्तान के भी तमाम बड़े शायर दोहा लिख रहे हैं। पिछले वर्ष आज ही के दिन गुफ़्तगू के ‘दोहा विशेषांक’ का विमोचन किया गया था, तब यह निर्णय लिया गया था कि अब प्रत्येक वर्ष हम दोहा दिवस का आयोजन करेंगे और दोहा को वर्तमान समय में अधिक प्रासंगिक बनाने के लिए काम करते रहेंगे। साहित्यकार रविनदंन से कहा कि दोहा एक लिबास है, कविता कहने के लिए लिबास की आवश्यकता होती है। दोहा के लिबास में कही गई कविता बेहद मारक होती है। पांचवीं सदी से सन 1000 तक अपभ्रंश का समय रहा है। दोहे की पहली पुस्तक सातवीं सदी में ‘बौद्ध व दोहागान’ है, जिसमें 84 सिद्ध कवियों के दोहे शामिल हैं। दोहे का पहला एकल संग्रह ‘स्ररवनाचार’ नाम से कवि देवसने की प्रकाशित हुई थी। दोहे का दूसरा एकल संग्रह ‘रामसिंह का पाहुड दोहा’ सन 970 में प्रकाशित हुआ था। श्री रविनंदन ने कहा कि अकबर ने तुलसीदास को अपने नौ रत्नों में शामिल करने के लिए त्योता भेजा, तो उसके जवाब ने तुलसीदास ने एक दोहा भेजा दिया, लिखा-

‘हम चाकर रघुवीर के, पटौ लिखौ दरबार/तुलसी अब क्या होवेंगे, नर के मन सबदार।’

मुख्य अतिथि समाजसेवी तारिक सईद अज्जु ने कहा कि इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और उनकी टीम ने दोहा पर कार्यक्रम की शुरूआत करके एक महत्वपूर्ण काम किया है, इससे नई पीढ़ी को दोहों की जानकारी हो रही है। ऐसे काम की सराहना की जानी चाहिए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि जमादार धीरज ने और संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। ओम प्रकाश ‘अंजाना’, असद ग़ाज़ीपुरी, अनिल मानव, डा. नीलिमा मिश्रा, अब्दुल सुब्हान, डा. अशोक अग्रहरि प्रतापगढ़ी, जय प्रकाश शर्मा ‘प्रकाशन’, जुनैद कबीर, कुमार अनुपम, ए.आर. साहिल, जमादार धीरज, संजय सक्सेना आदि ने दोहा पाठ किया। दोहा पाठ करने वाले सभी कवियों को गुफ़्तगू की ओर से ‘सहभागिता प्रमाण पत्र’ प्रदान किया गया। अंत में फ़रमूद इलाहाबादी ने सबके प्रति आभार व्यक्त किया।

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राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस

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