चैनलों में महिला एंकर बनने का रास्ता हमबिस्तर होकर ही गुजरता है

नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार संजीव पालीवाल को कौन नहीं जानता है। चैनलों पर वे अक्सर दिख जाते हैं। हालांकि वे कुछ दिनों से चैनलों पर वे कम ही दिखते हैं पर उनकी

 

 

नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार संजीव पालीवाल को कौन नहीं जानता है। चैनलों पर वे अक्सर दिख जाते हैं। हालांकि वे कुछ दिनों से चैनलों पर वे कम ही दिखते हैं पर उनकी एक किताब नैना ने कई सवाल खड़े किए हैं। नैना को लेकर वरिष्ठ पत्रकार रमेश ठाकुर ने अपने फेसबुक पर कुछ यूं लिखा है...।

 

पत्रकार संजीव पालीवाल टीवी मीडिया का बड़ा नाम है। पालीवाल साहब का लिखा हालिया उपन्‍यास 'नैना' महिला एंकर बनने की तल्ख़ सच्चाई को बता रहा है। कुछ अंश पढ़ने के बाद एक ही सवाल मन को कुरेद रहा है। क्‍या वास्तव में महिलाओं के एंकर बनने का रास्‍ता देह से ही होकर गुजरता है? या ऐसा कुछेक के साथ ही होता है? मैं थोड़ा इत्तेफाक इसलिए नहीं रखता, क्योंकि मौजूदा वक्त की ज्यादातर वीमेन एंकरों से अपने व्यक्तिगत संबंध और डिबेट्स में मुलाक़ात होने के चलते घनिष्ठता है, मित्रता है। ज्यादातर एंकर अपनी काबिलियत, परिष्कार, मेहनत और लगन से मुकाम हासिल किया है। कहानी में संजीव जी बताते हैं कि मुख्‍य पात्र एक टीवी चैनल की सुप्रस‍िद्ध एंकर नैना (परिवर्तित नाम) है, जिसकी राजनीतिक विषयों पर अच्‍छी पकड़ है। वह एक बढि़या पत्रकार है। इतनी गुणी होने के बावजूद वह अपने एडिटर गौरव (परिवर्तित)के साथ अक्‍सर हमबिस्‍तर होती है।

 

‍कहानी से इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि पति के नाकारेपन की वजह से वह अपने एडिटर से प्‍यार करने लगी। लेकिन एक कवरेज के दौरान राजस्‍थान जाने पर एक तथाकथित राजा के साथ भी बिना क‍िसी कमिटमेंट के वह रात गुजारना पसंद करती है। दूसरी तरफ जब उसे पता चलता है क‍ि एडिटर उससे काफी छोटी एंकर को भी प्‍यार करने का नाटक कर रहा है, तो उसका कच्‍चा च‍िट्ठा सबके सामने लाने की धमकी देती है, जो बाद में उसकी मौत का कारण भी बनता है।

 

इतना विरोधाभास क्यों? क्‍या पति से प्‍यार न पाने पर एंकर राह से भटक जाती हैं या एंकर बने रहने या जो बनने की राह पर होती हैं, वे इस न‍ियम को आत्मसात कर लेती हैं क‍ि एंकर‍ बनने के ल‍िए पहली शर्त चारित्रिक पतन स्वीकार करना है। क्‍योंकि उपन्यास में एक दूसरी पात्र आमना चौधरी जो अभी एंकरिंग के क्षेत्र में नई आई है, वह भी बॉस को फ़्लर्ट कर रही है या खुद हो रही है। पूरी कहानी में एक भी महिला पात्र नहीं है, जो अपनी योग्‍यता तथा अपनी शर्तों के साथ काम करती दिखाई देती है। क्या ऐसा सभी क्षेत्र में होता है या स्त्रियों की सफलता से ईर्ष्याग्रस्त पुरुषों का ये हीनतभरा कार्य है। कारण कई हो सकते हैं। मैं दावे से कह सकता हूं अगर ये गंध मीडिया में है, तो कमोबेश दूसरे क्षेत्र में अछूते नहीं हैं। कॉरपोरेट क्षेत्र की सच्चाई शायद बताने की जरूरत नहीं?

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राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस

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