गुलाबो सिताबो में खूब तिकड़में भिड़ाता है आम आदमी

आदमी अपनी जिंदगी में किसी चीज को हासिल करने के लिए क्या क्या जतन करता है, कितनी चालाकियां करता है, खूब तिकड़में भिड़ाता है, लेकिन अंत में हाथ लगती है, बस एक मुट्ठी धूल। एमेजॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज

आदमी अपनी जिंदगी में किसी चीज को हासिल करने के लिए क्या क्या जतन करता है, कितनी चालाकियां करता है, खूब तिकड़में भिड़ाता है, लेकिन अंत में हाथ लगती है, बस एक मुट्ठी धूल। एमेजॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की ‘गुलाबो सिताबो’ का केंद्रीय भाव यही है। यह पहली फिल्म है, जो बनी तो थी, बड़े पर्दे के लिए, लेकिन पूरे विश्व में एक साथ रिलीज हुई छोटे पर्दे यानी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर। इस फिल्म ने बड़े कलाकारों वाली फिल्मों के ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज किए जाने की संभावनाओं का एक बड़ा द्वार खोल दिया है। भविष्य में कई फिल्मकार इस राह पर चल दें, तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

फिल्म की शुरुआत होती है मिर्जा (अमिताभ बच्चन) के अपनी हवेली के किरायेदारों के बल्ब चुराकर बेचने और कठपुतली नृत्य ‘गुलाबो सिताबो’ से। ये दृश्य मिर्जा के किरदार की झलक पेश करते हैं और फिल्म के दूसरे मुख्य किरदार बांके रस्तोगी (आयुष्मान खुराना) के साथ मिर्जा के रिश्ते की भी झलक दे देते हैं। साथ ही, फिल्म के नाम के पीछे के तर्क को भी परिभाषित करते हैं। गुलाबो सिताबो उत्तर प्रदेश का प्रसिद्ध कठपुतली नृत्य है। लोक विश्वास है कि गुलाबो और सिताबो सौत थीं। दोनों साथ साथ रहती थीं, लेकिन दोनों में बिल्कुल नहीं बनती थी। एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाती थीं। लोक कथाओं में इन्हें ननद और भौजाई भी कहा जाता है। फिल्म के मुख्य किरदारों मिर्जा और उसके किरायेदार बांके का रिश्ता भी गुलाबो सिताबो जैसा ही है।

मिर्जा लखनऊ की एक बहुत पुरानी हवेली फातिमा महल की मालकिन बेगम (फारुख जफर) के पति हैं और उम्र में अपनी पत्नी से 17 साल छोटे हैं। मिर्जा हैं 78 साल के और उनकी बेगम फातिमा 95 साल की। भले ही हवेली बेगम के नाम है, लेकिन मिर्जा खुद को हवेली का मालिक समझते हैं और इस इंतजार में रहते हैं कि कब बेगम सिधारें और हवेली उनके नाम हो। वह बांके सहित हवेली के बाकी किरायेदारों को भगाना चाहते हैं, लेकिन बांके किसी कीमत पर हवेली नहीं छोड़ना चाहता। वह बाकी किरायेदारों का अघोषित नेता है।

मिर्जा और बांके के बीच चूहे-बिल्ली का खेल चलता रहता है। दोनों के चूहे-बिल्ली के खेल में पुरातत्त्व विभाग के अधिकारी ज्ञानेश शुक्ला (विजय राज) और वकील क्रिस्टोफर काला (बृजेंद्र काला) की आमद होती है और मामला अलग रंग लेने लगता है। ज्ञानेश 100 साल से ज्यादा पुरानी हवेली को पुरातत्त्व विभाग के संरक्षण में लाना चाहता है और लालच देकर बांके तथा बाकी किरायेदारों को अपनी ओर मिला लेता है। वहीं, क्रिस्टोफर दूसरी ही फिराक में है। वह मिर्जा को पट्टी पढ़ाता है और बेशकीमती हवेली को एक बिल्डर के हवाले करने का खेल रचता है। लेकिन परिस्थितियां ऐसा रोचक मोड़ ले लेती हैं कि सब हक्के-बक्के रह जाते हैं।

फिल्म में लखनऊ भी एक अहम किरदार है। ‘गुलाबो सिताबो’ में लखनऊ अपने पुराने अंदाज में दिखता है। लखनऊ के माहौल को रचने के लिए की गई मेहनत पर्दे पर दिखती है। इसके लिए आर्ट डायरेक्टर और उनकी टीम प्रशंसा के पात्र हैं। कैमरे ने भी पुराने लखनऊ और इसके मिजाज को बहुत अच्छे से पकड़ा है। अविक मुखोपाध्याय का कैमरा वर्क कमाल का है। शुजीत सरकार एक बेहतरीन निर्देशक हैं और उन्होंने इस फिल्म में भी अपनी साख को बनाए रखा है। हालांकि उनकी पिछली फिल्मों- ‘विक्की डोनर’, ‘पीकू’ और ‘ऑक्टोबर’ से ‘गुलाबो सिताबो’ की तुलना की जाए, तो यह फिल्म थोड़ी उन्नीस लगती है। बतौर निर्देशक शुजीत सरकार उस ऊंचाई पर नहीं पहुंच पाए हैं।

 

फिल्म को बहुत परफेक्शन के साथ बनाया गया है, लेकिन यह दर्शकों को पूरी तरह भिगो नहीं पाती। सेट, किरदारों का गेटअप, संवाद, लहजा सब कुछ अच्छे हैं, लेकिन भावनाओं की कमी थोड़ी खटकती है। जूही चतुर्वेदी का लेखन अच्छा है, हालांकि पटकथा में कहीं कहीं छेद भी है। फिल्म अपनी बात कहने में सफल है, लेकिन जिस शिद्दत से बात दर्शकों तक पहुंचनी चाहिए थी, उस तरह नहीं पहुंची पाती है। फिल्म की गति धीमी है, वैसे तो यह फिल्म के मिजाज और कथ्य को देखते हुए यह बहुत अखरता नहीं है, लेकिन मनोरंजन की खुराक थोड़ी और होनी चाहिए थी। मसाला मनोरंजन की चाह रखने वालों को यह फिल्म निराश कर सकती है।

अमिताभ बच्चन का अभिनय इस फिल्म की सर्वश्रेष्ठ बात है। मिर्जा के किरदार को उन्होंने जीवंत कर दिया है। उनके चलने का ढंग, बोलने का लहजा, आंखों का एक्सप्रेशन, सब कुछ बेहतरीन है। आयुष्मान खुराना भी अच्छे रहे हैं, हालांकि उनका किरदार थोड़ा और रोचक होता, तो बात ज्यादा बन सकती थी। विजय राज बेहतरीन अभिनेता हैं, उनका अपना एक अंदाज है। और, वह अंदाज यहां भी बरकरार है। बृजेंद्र काला की अभिनय शैली भी अपनी तरह की अलग शैली है और वह भी अपने अंदाज से प्रभावित करते हैं। बेगम की भूमिका में वयोवृद्ध कलाकार फारुख जफर खूब जंचती हैं। बहुत प्यारी लगती हैं। स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी सुकून देने वाली है। बांके की बहन गुड्डो के रूप में सृष्टि श्रीवास्तव का काम बेहतरीन है। वह असर छोड़ती हैं। मूक शेखू की भूमिका में नलनीश नील भी खासे प्रभावित करते हैं। अपने चेहरे के हावभाव और देह भंगिमा से वह बहुत कुछ बयां कर देते हैं। कुछ कमियों के बावजूद यह एकदम अलग मिजाज की फिल्म है। कुछ अलग हट के देखना हो, तो फिल्म देख सकते हैं।

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