कोविड-19 से अधर में लटकी शिक्षा..

कोविड १९ ने अर्थ व्यवस्था, स्वास्थ्य,समाजिकता,रिश्ते-नाते,हर क्षेत्र को प्रभावित कर दिया हैं। कोरोना के प्रभाव से कोई भी क्षेत्र अछूता नही रहा है। शिक्षा पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ा हैं। कोविड १९ ने शिक्षा को तो बहुत ही बुरी तरह विचलित किया हैं। लाखों परीक्षाएं स्थगित की गई है। कई शिक्षण सत्र बीच में ही रोक दिये गए हैं। कोविड १९ ने शिक्षक-शिष्य और अभिवावकों को पूर्णत: प्रभावित किया हैं।

 



कोविड १९ ने अर्थ व्यवस्था, स्वास्थ्य,समाजिकता,रिश्ते-नाते,हर क्षेत्र को प्रभावित कर दिया हैं। कोरोना के प्रभाव से कोई भी क्षेत्र अछूता नही रहा है। शिक्षा पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ा हैं। कोविड १९ ने शिक्षा को तो बहुत ही बुरी तरह विचलित किया हैं। लाखों परीक्षाएं स्थगित की गई है। कई शिक्षण सत्र बीच में ही रोक दिये गए हैं। कोविड १९ ने शिक्षक-शिष्य और अभिवावकों को पूर्णत: प्रभावित किया हैं।
    गर्मियों में लगने वाली स्कूल की कक्षाएं नही लग पाई,जिसके कारण शिक्षक और शिष्य दोनो परेशान हो रहे हैं। हालांकि सुचारू रुप से शिक्षा को चलाने के लिए सरकार ने कई तरह के प्रयास भी किये हैं जैसे-डिजिटल शिक्षा,ऑनलाइन क्लासेस,दूरदर्शन के द्वारा शिक्षा देना,इसी तरह कई प्रायवेट स्कूलों और कोचिंग में भी पढ़ाई चल रही है।  कई शिक्षकों पर स्कूल संचालकों द्वारा दबाव भी डाला जा रहा है, कि वह शिष्यों को कै से भी करके का ३० प्रतिशत कोर्स कम्प्लीट कराएं, ताकि बच्चों का कोर्स पूरा हो सके साथ ही स्कूल संचालक फीस भी ले सके। कोरोना सत्र में अधिकतर शहरी बच्चों को तो अॅानलाइन शिक्षा देना शुरू कर दिया गया हैं। यू.के.जी. से लेकर कालेज तक की अॅानलाइन पढ़ाई शुरू कर दी गई हैं। इसलिए शिक्षको ने भी रोज २-२ घंटे क्लास लेना शुरू कर दिया हैं। बच्चों को भी पढऩा अनिवार्य हो गया हैं। क्योंकि बच्चों पर भी अभिवावकों का दबाव,तो उन्हे तो पढऩा ही है। इस तरह पढ़ाई सत्र शुरू कर दिया गया हैं। अब बच्चे फोन को कई घंटे अॅापरेट कर रहे हैं। क्योंकि अलग अलग विषय के अलग अलग शिक्षक, सभी शिक्षको को एक एक घंटा तो देना ही हैं। साथ ही असाइंमेंट भी बनाना और फिर उनके टेस्ट भी देना हैं। ८ वी से १२ तक तो फिर भी ठीक है। अब यही क्रम छोटे-छोटे बच्चों का भी शुरू कर दिया गया हैं। बच्चों को सुबह ८ से १२ तक तो अॅानलाइन पढ़ाई करना ही है, फिर उनके असाइनमेंट बनाना, असाइनमेंट की सामग्री भी मोबाईल से ही लेना है। फिर चार बजे से दूसरे विषय की पढ़ाई। उसके भी असाइनमेंट। कहने का तात्पर्य यह है, कि आज बच्चों को कई-कई घंटे मोबाइल पर बिताना पड़ रहा है। इस तरह की पढ़ाई शहरों तक तो हो रही हंै। किंतु शहर के बाहर गांव के बच्चे,उन तक यह शिक्षा नही पहुंच पा रही। कई बच्चे ऐसे भी है, जिनके पास टेलीविजन,स्र्माट फोन नही है। अगर फोन है, तो गांव में नेटवर्क नही हैं। ऐसी स्थिति में कोई बच्चा कैसे शिक्षण ग्रहण कर सकता है? इस स्थिति के बावजूद भी स्कूल संचालक फीस के लिए अभिवावकों पर दबाव बना रहे हैं। आज अभिवावक दोनो ओर से पिस रहा हैं। एक तो स्कूल-कोचिंग की फीस,दूसरा बच्चों का स्वास्थ्य। इन दो महिनो में बच्चों ने सर्वाधिक मोबाईल चलाया हैं। जिसके कारण खासकर उनकी आंखों और स्वास्थ्य पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा हैं। साथ ही उनको मानसिक तनाव भी झेलना पड़ रहा हैं।
   हमारे पौराणिक काल में शिक्षा सरल,ज्ञानवर्धक और स्वास्थ्यवर्धक हुआ करती थी। किंतु आज की शिक्षा उतनी ही कठीन व तनावग्रस्त हो गई हैं। और इस कोरोना काल में तो शिक्षा और भी अधिक तनावग्रस्त हो चुकी हैं। क्या हमारे मासुम बच्चों को तनावमुक्त शिक्षा नही मिल सकती हैं? क्या इस तरह के शिक्षण का कोई और विकल्प नही हैं?



वैदेही कोठारी (स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखिका)

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राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस

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