श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्रदायिनी गुप्त नवरात्रि

चैत्र अर्थात वासन्तीय नवरात्र अर्थात नवरात्रि और आश्विन अर्थात शारदीय नवरात्र (नवरात्रि) के बारे में सभी जानते हैं, लेकिन विशेष कामनाओं की सिद्धि के लिए इसके अतिरिक्त भी अन्य और दो

 

-अशोक “प्रवृद्ध”

 

चैत्र अर्थात वासन्तीय नवरात्र अर्थात नवरात्रि और आश्विन अर्थात शारदीय नवरात्र (नवरात्रि) के बारे में सभी जानते हैं, लेकिन विशेष कामनाओं की सिद्धि के लिए इसके अतिरिक्त भी अन्य और दो नवरात्र(नवरात्रि) होते हैं, जिनका ज्ञान बहुत कम लोगों को होने के कारण अर्थात इसके छिपे होने के कारण ही इनको गुप्त नवरात्र (नवरात्रि) की संज्ञा दी गई है । वर्ष में दो बार ये गुप्त नवरात्र आते हैं - माघ मास के शुक्ल पक्ष व आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में। इस प्रकार कुल मिला कर वर्ष में चार नवरात्र होते हैं - चैत्र नवरात्र, आश्विन नवरात्र, माघी नवरात्र और आषाढी नवरात्र।। चारों ही नवरात्र ऋतु परिवर्तन के समय मनाये जाते हैं और इन विशेष अवसरों परसमस्त मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पूजा-पाठ आदि किये जाते हैं।पौराणिक व शाक्त ग्रन्थों में देवी भगवती दुर्गा की उपासना के लिए नवरात्र काल सर्वोत्तम माना गया है। चैत्र के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक मनाई जाने वाली नवरात्र को वासन्तीय नवरात्र तथा आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक मनाई जाने वाली नवरात्र को शारदीय नवरात्र कहा जाता है।माघ मास में शुक्ल पक्ष व आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली नवरात्र को गुप्त नवरात्र कहते हैं।इन दिनों में भगवती दुर्गा के व्रत रखे जाते हैं और स्थान- स्थान पर माँ की मूर्तियाँ बनाकर उनकी देवी केशैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री रूपों की उपासना- आराधना किये जाने की पौराणिक परिपाटी है।पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार गुप्त नवरात्रों में भी माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना के साथ ही दस महाविद्या की पूजा की जाती है। गुप्त नवरात्र में तंत्र साधना भी की जाती है।गुप्त नवरात्रों को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने से विवाह, नौकरी, रोग, धन-सम्पदा, ग्रहों का विपरीत प्रभाव आदिकई बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं।शिवसंहिताके अनुसार गुप्त नवरात्र भगवान शंकर और आदिशक्ति माँ पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं।गुप्त नवरात्र सनातन धर्म में उसी प्रकार मान्य हैं, जिस प्रकार शारदीयऔर चैत्र नवरात्र। आषाढ़ और माघ माह के नवरात्रों का लोगों को बहुत कम ज्ञान होने के कारण ही इन्हें गुप्त नवरात्र कह कर पुकारा जाता है। गुप्त नवरात्र मनाने और इनकी साधना का विधान देवी भागवत पुराणव अन्य शाक्त ग्रन्थों में अंकित प्राप्य है। श्रृंगी ऋषि ने गुप्त नवरात्रों के महत्त्व को बतलाते हुए कहा है किजिस प्रकार वासंतिक नवरात्र में भगवान विष्णु की पूजा और शारदीय नवरात्र में देवी शक्ति की नौ देवियों की पूजा की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार गुप्त नवरात्र दस महाविद्याओं के होते हैं। इन महाविद्याओं के रूप में शक्ति की उपासना करने वालों का जीवन धन-धान्य, राज्य सत्ता और ऐश्वर्य से भर जाता है। इस वर्ष आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की गुप्त नवरात्रि 22 जून आषाढ़ शुक्ल प्रथमा  से प्रारम्भ हो रही है।


 

 

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार नवरात्रि वर्ष में चार बार आती है। चार बार का अर्थ यह कि यह वर्ष के महत्वपूर्ण चार पवित्र माह में आती है। यह चार माह है- पौष, चैत्र, आषाढ और अश्विन।कुछ स्थानों पर माघ महीने के स्थान पर पौष में गुप्त नवरात्र होने की बात भी कही गई है। लेकिन सभी स्थानों पर उक्त प्रत्येक माह की प्रतिपदा से नवमी तक का समय नवरात्रि का माना गया है। चैत्र माह की नवरात्रि को बड़ी नवरात्रि और अश्विन माह की नवरात्रि को छोटी नवरात्रि कहते हैं। तुलजा भवानी बड़ी माता है तो चामुण्डा माता छोटी माता है। बड़ी नवरात्रि को बसंत नवरात्रि और छोटी नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि कहते हैं। प्रथम संवत प्रारंभ होते ही बसंत नवरात्रि व दूसरा शरद नवरात्रि, जो कि आपस में छःमाह की दूरी पर है। उल्लेखनीय है कि भारत में दीपावली के पूर्व आने वाली अश्विन मास की नवरात्रि ज्यादा प्रचलित है। इस समय उत्सव के माहौल में लोग झूमते- गाते गरबा नृत्य करते हैं और कन्याओं को भोजन करवाते हैं। पितृपक्ष के सोलहदिनों की समाप्ति के बाद आश्विन मास की नवरात्रि का प्रारंभ होता है। इसी नवरात्रि के प्रारंभ होने के साथ ही भारत में लगातार उत्सव और त्योहारों का प्रारंभ भी हो जाता है। शेष बचे दो आषाढ़ और पौष अथवा माघ माह की नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहते हैं। साधना के लिए महत्वपूर्ण इन नवरात्रियों में आषाढ़ सुदी प्रतिपदा से नवमी तक दूसरा पौष अथवा माघ सुदी प्रतिप्रदा से नवमी तक में विशेष पूजा- पाठ का विधान है। ये दोनों नवरात्रि युक्त संगत है, क्योंकि ये दोनों नवरात्रि अयन के पूर्व संख्या संक्रांति के हैं। यही नवरात्रि अपने आगामी नवरात्रि की संक्रांति के साथ-साथ मित्रता वाले भी हैं।जैसे आषाढ़ संक्रांति मिथुन व ‍आश्विन की कन्या संक्रांति का स्वामी बुध हुआ और पौष संक्रांति धनु और चैत्र संक्रांति मीन का स्वामी गुरु है। इसलिए ये चारों नवरात्रि वर्ष में तीन -तीनमाह की दूरी पर हैं। चैत्र की तरह ही पौष का महीना भी विधि व निषेध वाला है अत: प्रत्यक्ष चैत्र गुप्त आषाढ़ प्रत्यक्ष आश्विन गुप्त पौष माघ में श्री दुर्गा माता की उपासना करने से हर व्यक्ति को मन इच्छित फल प्राप्त होते हैं।देवी भागवत के अनुसार जिस तरह वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं।गुप्त नवरात्र के दौरान कई साधक महाविद्या (तंत्र साधना) के लिए मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा करते हैं।भगवान विष्णु शयन काल की अवधि के बीच होते हैं तब देव शक्तियां कमजोर होने लगती हैं। उस समय पृथ्वी पर रुद्र, वरुण, यम आदि का प्रकोप बढ़ने लगता है इन विपत्तियों से बचाव के लिए गुप्त नवरात्र में मां दुर्गा की उपासना की जाती है।

 

 


 

पौराणिक ग्रन्थों में गुप्त नवरात्रों का बड़ा ही महत्त्व बताते हुए कहा गया है कि मानव के समस्त रोग-दोष व कष्टों के निवारण के लिए गुप्त नवरात्र से बढ़कर कोई साधना काल नहीं हैं। श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्राप्ति के साथ ही शत्रु संहार के लिए गुप्त नवरात्र में अनेक प्रकार के अनुष्ठान व व्रत-उपवास के विधान पौराणिक ग्रन्थों में अंकित हैं। मान्यता है कि इन अनुष्ठानों के प्रभाव से मानव को सहज ही सुख व अक्षय ऎश्वर्य की प्राप्ति होती है। दुर्गावरिवस्या नामक ग्रन्थ के अनुसारवर्ष में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्रों में भी माघ में पड़ने वाले गुप्त नवरात्र मानव को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं, बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ माता दुर्गा की उपासना करने वाले व्यक्ति को अनेक सुख व साम्राज्य भी प्राप्त होते हैं।शिवसंहिता के अनुसार ये नवरात्र भगवान शंकर और आदिशक्ति माँ पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं।गुप्त नवरात्रों को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने से विवाह में आने वाली बाधाओं के साथ ही जीवन में आने वाली कई बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं, कन्याओं को मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है।दुर्गास्तवनम् नामक प्राचीन ग्रन्थ में वैवाहिक बाधा दूर होकर कुमारी कन्या का विवाह शीघ्र ही योग्य वर से संपन्न हो जाने के सम्बन्ध में विस्तृत विवरणी अंकित है।


 

शाक्त ग्रन्थों के अनुसार आदिशक्ति का अवतरण सृष्टि के आरंभ में हुआ था। कभी सागर की पुत्री सिंधुजा-लक्ष्मी तो कभी पर्वतराज हिमालय की कन्या अपर्णा-पार्वती। तेज, द्युति, दीप्ति, ज्योति, कांति, प्रभा और चेतना और जीवन शक्ति संसार में दृश्यमान सभी वस्तुओं में देवी का ही दर्शन होता है। भक्तों की विश्व-दृष्टि में सर्वत्र विश्वरूपा देवी ही दिखाई देती हैं, इसलिए माता दुर्गा ही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है। देवीभागवत के अनुसार देवी ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश का रूप धर संसार का पालन और संहार करती हैं। जगन्माता दुर्गा सुकृती मनुष्यों के घर संपत्ति, पापियों के घर में अलक्ष्मी, विद्वानों-वैष्णवों के हृदय में बुद्धि व विद्या, सज्जनों में श्रद्धा व भक्ति तथा कुलीन महिलाओं में लज्जा एवं मर्यादा के रूप में निवास करती है। इसीलिए मार्कण्डेयपुराण में कहा गया है कि- हे देवि! तुम सारे वेद-शास्त्रों का सार हो। भगवान विष्णु के हृदय में निवास करने वाली माँ लक्ष्मी-शशिशेखर भगवान शंकर की महिमा बढ़ाने वाली माँ तुम ही हो।


 

माघी नवरात्र में पंचमी तिथि सर्वप्रमुख मानी जाती है। इसे श्रीपंचमी, वसंत पंचमीऔर सरस्वती महोत्सव, वसन्तोत्सव , मदनोत्सव आदि के नामों से जाना जाता है। प्राचीन काल से श्रीपंचमी के दिन माता सरस्वती का पूजन-अर्चन किये जाने की परिपाटी प्रचलित है। यह त्रिशक्ति में एक माता शारदा के आराधना के लिए विशिष्ट दिवस के रूप में पौराणिक ग्रन्थों में अंकित है। मान्यता है कि विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से इस दिन माँ सरस्वती का पूजन करना चाहिए। देववाणी संस्कृत भाषा में निबद्ध शास्त्रीय ग्रन्थों का दान संकल्प पूर्वक विद्वान् ब्राह्मणों को देना चाहिए।गुप्त नवरात्र में संपूर्ण फल की प्राप्ति के लिए अष्टमी और नवमी तिथि को आवश्यक रूप से देवी के पूजन का विधान शास्त्रों में वर्णित है। माता के संमुख जोत दर्शन एवं कन्या भोजन करवाना चाहिए।स्त्री रूप में देवी पूजा का शास्त्रीय विधान भी  बताया गया है।कूर्मपुराणमें पृथ्वी पर देवी के बिंब के रूप में स्त्री का पूरा जीवन नवदुर्गा की मूर्ति के रूप से बताया गया है। जन्म ग्रहण करती हुई कन्या शैलपुत्री, कौमार्य अवस्था तक ब्रह्मचारिणी व विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से चंद्रघंटा कहलाती है। नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने से कूष्मांडा व संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री स्कन्दमाता होती है। संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री कात्यायनी व पतिव्रता होने के कारण पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से कालरात्रिकहलाती है। संसार का उपकार करने से महागौरी व धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार को सिद्धि का आशीर्वाद देने वाली सिद्धिदात्री मानी जाती हैं।

जनसत्ता एक्सप्रेस एक स्वतंत्र मंच है। जहां आपको अपनी बात रखने की, अपने विचार रखने की, अपने जज्बात रखने की खुली छूट है। पर एक बात यहां साफ कर दें कि पत्रकारिता के भी कुछ मूलभूल सिद्धांत हैं जिससे परे हम लोग भी नहीं। पर आप जनसत्ता एक्सप्रेस के साथ किसी भी रूप में जुड़ना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। हम या आपको उतना ही आदर देंगे, सम्मान देंगे जितना अपने सहकर्मी को। इसलिए आप अपने क्षेत्र की खबरें, वीडियो हमें शेयर करें। हम उन्हें जनसत्ता एक्सप्रेस पर प्रकाशित करेंगे। इसके लिए आप jansattaexp@gmail.com का उपयोग कर सकते हैं। या फिर हमें आप whatsup भी 7678313774 पर कर सकते हैं। फोन तो आप कर ही सकते हैं। इसलिए एक नेक काम के लिए, पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए हमारे साथ, हमारी टीम का हिस्सा बनिए और स्वतंत्र पत्रकार, फोटोग्राफर, स्तंभकार के रूप में अपने अंदर के पत्रकार को जिंदा रखिए। हमारी टीम तो आपके साथ है ही।

राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस