धर्मनिरपेक्षता और प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री

बीते कुछ 5 वर्षों में धर्मनिरपेक्षता संकट में आ गई है वास्तव में धर्मनिरपेक्षता अपने वजूद के साथ ही खतरे में आ गई थी


श्रीराजेश
बीते यही कोई पांच-छह वर्षों से देश की धर्मनिरपेक्षता खतरे में आ गई है. वास्तव में धर्मनिरपेक्षता अपने वजूद में आने के साथ ही खतरे में आ गई था, क्योंकि इसकी नियती ही यहीं है. धर्म से निरपेक्ष हो कर भला किसी सकारात्मक परिणति की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है? धर्म के प्रति सापेक्ष ही होना होगा. जब तक आप अपने धर्म के प्रति सापेक्ष नहीं होंगे, किसी अन्य धर्म के प्रति आप कभी भी उदार व सहिष्णु नहीं हो सकते. भाषा विज्ञान की दृष्टि से भी देखें तो ‘धर्मसापेक्ष’ शब्द अर्थवान है, ‘धर्मनिरपेक्ष’ नहीं. धर्मनिरपेक्षता मानवता को खंडित करने वाला शब्द है. जब मनुष्य धर्म से ही निरपेक्ष हो जाएगा तो स्वाभाविक है कि वह पशुता के करीब या लगभग पशु ही हो जाएगा. धर्म को धारण किए बगैर मनुष्यता के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती. लेकिन दुर्भाग्य है कि आरंभ से ही ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को सर्वधर्म समभाव के सामानांतर कृत्रिम रूप से स्थापित करने का कुत्सित प्रयास किया गया, जो कि नितांत आधारहिन है तो स्वाभाविक है, कि जिसका कोई आधार नहीं होता वह लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रहता. धर्मनिरपेक्षता का अस्तित्व मिट रहा है- जो कि एक शुभ संकेत है. जब धर्मसापेक्ष मनुष्य होगा तो वह सभी धर्मों के मर्म को समाहित कर सकेगा महसूस कर सकेगा और सभी धर्मों के प्रति वह श्रद्धावान हो सकेगा. ऐसा होना एक वैश्विक क्रांति होगी और इस वैश्विक क्रांति का आगाज भारत से हो चुकी है.
इस धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत ने भूमिपुत्रों को स्वधर्म की स्वीकारोक्ति से न केवल रोकता है बल्कि अन्य धर्मों द्वारा भूमिपुत्र धर्मानुयायियों का मनोवैज्ञानिक शोषण करता है. धर्म और राजनीति गहरे तक जुड़ी है- राजनीतिक का धर्म होता है, धर्म की राजनीति नहीं होती. स्वतंत्र भारत में बीते सात दशक में राजनीतिक धर्म च्यूत हो चुका है, धर्म की राजनीति का बोलबाला रहा है. इसके लिए अगर कोई सीधे-सीधे जिम्मेदार है तो वह है आजादी के बाद सत्ता प्रतिष्ठान पर विराजमान रहने वाला दल. लेकिन वर्ष 2014 के बाद से भारत स्वधर्म को पहचान गया है. हिमालय से हिंद महासागर तक की फीजा अब आक्रांताओं द्वारा प्रतिपादित व्याख्याओं को खारिज कर रहा है और अपनी मूल को परिभाषित करने लगा है. इस नई परिभाषा ने देश के मिजाज को बदला है. यह बदलाव सही दिशा में है, यह प्रमाणित भी होता है. क्योंकि धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत और आक्रांताओं द्वारा प्रतिपादित व्याख्याओं को खाद-पानी देने वाले लगातार रित रहे हैं. 
आज कहा जा रहा है कि वर्तमान भारत की सत्ता पर हिंदुत्ववादी सरकार के आने के बाद से भारत के पड़ोसियों से संबंध खराब हो रहे हैं. निःसंदेह यह सच है. पड़ोसियों द्वारा अतिक्रमण को अब तक बर्दास्त किया जाता था तो पड़ोसियों से संपर्क अच्छे थे, लेकिन अब भारत अपने भू-भाग का अतिक्रमण करने वालों से अपना वह भू-भाग लेने की बात कर रहा है, क्रियाएं कर रहा है तो स्वाभाविक ही संबंध खराब होंगे. अतीत के सत्ता प्रतिष्ठानों ने तो वर्तमान भारत को कुछ ऐसे पड़ोसी भी ला कर दिये हैं, जो कभी हमारे पड़ोसी थे ही नहीं, और उन्हीं नये-नये नवेले पड़ोसियों की वजह से 1962, 1967 और 2020 में हमने अपने हजार से ज्यादा वीर सपूत खोये.
देश की सत्ता पर छह दशक तक शासन करने वाली कांग्रेस की ओर से प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री जी पूछ रहे हैं कि लद्दाख सीमा पर भारतीय सैनिकों को निःशस्त्र किसने और क्यों भेजा? इस सवाल का जवाब माननीय प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री जी आपको अपने पूर्वज द्वारा किये गये कार्यों के अवलोकन से मिल जाएगा, थोड़ा श्रम तो करें. जिस चीन की सीमा भारत के किसी भू-भाग से नहीं मिलती थी, अब उसके साथ सीमा विवाद हो रहा है तो इस सीमा को किसने अस्तित्व में लाया था, यह सवाल भी माननीय प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री जी को पूछना चाहिए. हमारी सीमा चीन के बजाय तिब्बत से मिलती थी, जिसे माननीय प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री जी के परनाना तथा देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने माओ ज़ेडोंग को थाली में रख कर परोसा था. अक्साई चिन तो बंजर पथरीला जमीन का टुकड़ा था ना? जिसे चीन ने कब्जा लिया तो उससे लेने के बजाय यहीं कहा था न पंडित नेहरू जी ने?
 2004 से 2014 तक आपकी ही सरकार सत्ता में थी, तब क्या आपने अक्साई चिन को लेकर कभी कोई बात की. नहीं ना? हां, 2008 में आपने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जरूर एक करार किया, जिससे आप और वो दोनों अपने वैचारिकी का आदान-प्रदान कर सके. इसी वैचारिकी आदान-प्रदान की प्रतिबद्धता के कारण आप 2017 में  दिल्ली-स्थित चीनी दूतावास में चाउमीन और मोमो का आनंद ले रहे थे, उस समय शी जिनपिंग डोकलाम को दखलिया रहे थे. मानसरोवर के रिक्त होने व सांप-बिच्छु तक खा जाने वाले चीनियों द्वारा राजहंसों को पका कर खाने पर आपके हृदय में कभी कोई दर्द नहीं हुआ. मैं मानता हूं कि चीनियों का यह कृत आपको हृदयविदारक नहीं लगेगा. क्योंकि आप सिर्फ चुनाव जीतने के लिए ही जनेव धारण करते हैं, जनेव धारण करने के पूर्व जो उपनयन संस्कार होते हैं उससे आप संस्कारित नहीं है. यह उस संस्कार विहिनता का द्योतक है कि राजहंसों के गर्दन मरोड़े जाने पर आपको दर्द नहीं हुआ. 
माननीय प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री जी अब आपके चीर साथी की भी बात की जाए. 19 जून, 2020 को भारत के लद्दाख सीमा पर हुए विभत्स हिंसक संघर्ष के बाद उपजी परिस्थितियों पर प्रधानमंत्री द्वारा आहुत सर्वदलीय बैठक में आपकी माता श्री के साथ ही आपके साथी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा भी मौजूद थे. इस बैठक में उनका सारा ध्यान इसी ओर था कि भारत अपना सामरिक सहयोग अमेरिका के साथ क्यों कर रहा है, लेकिन डी राजा ने एक शब्द भी चीन के संबंध में नहीं कहा. इसी तरह भारत में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक नंबूदरीपाद महोदय जी ने 1962 में चीन द्वारा असम पर किये गये हमले के समय कहा था – ‘भारत का कहना है चीन ने हमला किया. चीन बोलता है भारतीय सैनिकों ने घुसपैठ की. हमारी पार्टी जांच करेगी, फिर बताएगी कि आक्रमण किसने किया था.’ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने जांच की या नहीं की, अब तक उस जांच की रिपोर्ट भारतीय जनमानस के सामने नहीं आई. लेकिन नंबूदरीपाद जी के उतराधिकारी आज भी उसी मनोस्थिति में है. 
माननीय प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री जी अब भी समय है. कृपया राजनीति के सिद्धांत और मर्यादाओं के निर्वहन तथा राष्ट्रहित के कुछ पंक्तियों का अध्ययन कर उसे अपने आचार-विचार में शामिल करें अन्यथा आप सदैव ही माननीय प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री ही रहेंगे.

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राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस

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