कोरोना का संकट और हमारी समस्याएं 

आज यह विचित्र स्थिति है कि हमारे चारों ओर  अनेक तरह की समस्याएं दिन पर दिन बढ़ी जा रही हैं और उसके समाधान के रास्ते खुल नहीं रहे। एक तो पहले से ही कोरोना संकट पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका है तो दूसरी

 

आज यह विचित्र स्थिति है कि हमारे चारों ओर  अनेक तरह की समस्याएं दिन पर दिन बढ़ी जा रही हैं और उसके समाधान के रास्ते खुल नहीं रहे। एक तो पहले से ही कोरोना संकट पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका है तो दूसरी ओर आत्म हत्याएं  और जानबूझकर की गई हत्याएं की घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। पिछले दिनों सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की खबरों ने मानव मन  को हिला कर रख दिया। इसके साथ ही इसी तरह की कई खबरों ने भी हमें बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर किया है जिसमें किसी न किसी रूप में मानवता पर संकट के संकेत की खबरें भी देखी गई हैं । कहना नहीं होगा कि विज्ञान के बढ़ते चरण के साथ-साथ हमारे चारों ओर समस्याओं का लंबा- चौड़ा दौर शुरू हो चुका है और हम एक ऐसी परिस्थिति में जी रहे हैं जहां अशांति , दुख- दर्द, भयावहता  देखने को मिल रही है। बाहर से आने वाले कामगार, मजदूरों के साथ साथ छात्र-छात्राओं का भविष्य भी चिंता और परेशानी से भरा हुआ दिखलाई पड़ रहा है। पढ़ने- पढ़ाने के जो खुशनुमा माहौल थे उस पर आज पानी फिर गया है। व्यापार और नौकरी से जुड़े हुए लोग भी जो बाहर से अपने  घरों को लौट आए है वे भी हताश- निराश दिखलाई पड़ते हैं । ऐसे वक्त  के लिए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण द्वारा कही गई ये काव्य पंक्तियां याद आती हैं :

हम कौन थे क्या हो गये और क्या होंगे अभी

 

 आओ बिचारें तो जरा  ये समस्याएं सभी।

 

 कहना नहीं होगा कि  भारत में समस्याएं पहले नहीं थीं।  और कालांतर में विभिन्न परिस्थितियों के साथ वे आज अचानक आ धमकी हैं। बल्कि सच्चाई यह है कि मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ  मानवीय समस्याएँ   भी पैदा होती रही हैं। समय के थपेड़ों के साथ -साथ हमने उस अनुसार अपने को ढालने के लिए सीखा है और सुख- दुख को अपनाते हुए जीवन जीने का आनंद भी प्राप्त किया है। किंतु कोरोना संकट के इस काल ने आकर  हमारे चारों ओर भयावहता की एक ऐसी तस्वीर खींच दी है जिससे समस्त मानव जाति प्रभावित हो चली है। पशु-पक्षी भले ही इससे प्रभावित देखते रहे हों किंतु मानवीय दुख में उनका भी सुख और साहचर्य देखने में आया है। हमें लगता है कि प्रकृति भी हमारे दुख से अवश्य दुखी होगी। किंतु इतना तो निश्चित है कि हमें अब इस दुख के साथ जीना भी है और मरना भी, साथ ही साथ प्रकृति की हरियाली, उसकी सुंदरता, उसकी कोमलता और उसके विभिन्न अंगों और उपांगों  को बचा कर रखने की भी जरूरत है। शायद प्रकृति के साथ ज्यादती ईश्वर को भी मंजूर नहीं है। हमने नदियों के साथ, हरे-भरे वृक्षों के साथ, पहाड़ों और झरनों के साथ, खुले खेत में और मैदानों के साथ, आम जिंदगियों के साथ  ज्यादती  की हैं। हमें उसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। सदियों से चली आ रही धर्मांधता और कुत्सित  परंपराओं  ने हमें बार-बार तोड़ने का प्रयास किया है। हमारी एकता और अखंडता को कमजोर बनाया है। संस्कृति और संस्कार तथा पवित्र विचारधारा को प्रभावित किया है। मानवीय जीवन मूल्यों का  बारंबार क्षरण हुआ है। कहना नहीं होगा कि आज हम पाश्चात्य संस्कृति से बुरी तरह प्रभावित हैं और बहुत- कुछ उसी पर अपने आप को निर्भर बना हुआ पाते हैं। हम भले ही चीन, जापान, अमेरिका आदि देशों के सहारे अपने को विकसित महसूस कर रहे हों  किंतु हमें आज या कल अपनी पहचान बनानी ही होगी। ऐसा नहीं है कि दुनिया में हमारी पहचान नहीं है और भारतीय धर्म,  दर्शन , संस्कृति, साहित्य और  विचारधारा की  प्रासंगिकता  समग्र संसार में  नहीं है  किंतु आज भारत जिस रूप में विवश और लाचार नजर आता है ; यह चिंता की बात है और इस पर गंभीरता के साथ विचार करने की भी जरूरत है।

 

 सच पूछा जाए तो आज हम सब अनेक  समस्याओं से ग्रस्त हैं। शिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, किशोर और युवा मन की हताशा, राजनीतिक दांवपेच, आपसी अविश्वास, अरुचिकर कृषि- व्यवसाय  और उद्योग धंधों की समस्या ने आम आदमी को प्रभावित किया है। यही कारण है कि हम चारों ओर एक प्रकार की किंकर्तव्यविमूढ़ता जन्य स्थिति और निराशावाद  को पैदा हुआ देख रहे हैं। दलित, महिलाएं और अल्पसंख्यक तो पहले से ही हाशिए पर हैं, इसके साथ साथ मानवीय जीवन मूल्यों का ह्रास भी चारों ओर दिखलाई पड़ रहा है। अतः आज हम एक ऐसे संकट के दौर में जी रहे हैं जो मूलतः मानव जाति के अस्तित्व के लिये ही  खतरनाक सिद्ध हो रहा है।

 

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अधिक से अधिक अपने आप को प्रकृति से जोड़ना सीखे। प्रकृति को बचाकर रखने का प्रयास करें। मानवीय जीवन मूल्य को संरक्षित करने के लिए  अपने-अपने स्तर से प्रयास करें। एकल परिवार से अलग हटकर  हम संयुक्त परिवार को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास करें। अब समय आ गया है कि हम अब हम बड़े- बुजुर्गों की सेवा में अपने आप को लगाएं:

 

 अभिवादनशीलस्य नित्यम वृद्धोपसेविनः ।

 

चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ।।

 

 विगत 15-20  वर्षों से  हमने महसूस किया है कि हम अपनी भाषा और संस्कृति से अलग-थलग होते जा रहे हैं। हिंदी भाषा के प्रति जो रुझान होना चाहिए वह पूरी तरह समाप्त हो चुका है। इसके साथ साथ संस्कृत भाषा के प्रति भी हमारी दिलचस्पी दिन पर दिन घटती चली जा रही है। यह स्थिति भी चिंता पैदा करने वाली है। संस्कृत साहित्य में अनेक ऐसे मनोरंजक और ज्ञानवर्धक ग्रंथों की रचना की गई है जिसका हमें ठीक से पता नहीं है और न उसको जानने की हमारे मन में कोई जिज्ञासा ही रह गई है। पंचतंत्र, जातक कथाएं और इसी तरह की अन्य कथाएं , जो मानव जीवन के सरोकार से जुड़ा हुआ है उसके विधिवत अध्ययन और उसके सम्यक प्रचार-प्रसार की जरूरत है ।अतः आज के इस परिवेश में  हमें अपनी भाषा ,संस्कृति और साहित्य से  रूबरू होने की आवश्यकता है  । यह हमें नया मार्ग दिखला सकता है, हमारे भीतर जो निराशा और हताशा के भाव पैदा हो रहे हैं ;   उसका निवारण कर सकता है । अतः हमें इन बातों पर विचार करना चाहिए।

पंडित विनय कुमार (हिन्दी शिक्षक )

शीतला नगर रोड नंबर-3

पोस्ट- गुलजार बाग 

अगमकुआँ, पटना (बिहार)

पिन-800 007

मोबाइल- 9334504100

              7991156839

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राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस

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