नव उदारवादी व्यवस्था और कोविड19

कोविड 19 काल की एक तपती हुई उदास दोपहर में बालीवुड की सबसे मशहूर फिल्मों में से एक मुगल ए आजम का एक संवाद याद आ रहा है “मैं हिन्दुस्तान हूँ. हिमालिया मेरी सरहदों का निगहबान है. गंगा मेरी पवित्रता की सौगंध.

 

अमित कुमार प्रधान, नई दिल्ली

कोविड 19 काल की एक तपती हुई उदास दोपहर में बालीवुड की सबसे मशहूर फिल्मों में से एक मुगल ए आजम का एक संवाद याद आ रहा है “मैं हिन्दुस्तान हूँ. हिमालिया मेरी सरहदों का निगहबान है. गंगा मेरी पवित्रता की सौगंध. तारीख़ की इब्तदा से मैं अंधेरों और उजालों का साक्षी हूँ”..Iइतिहास के आरम्भिक दौर से ही भारत ने सफलताओं और असफलताओं से निरन्तर जूझते हुए अवसरों को समझा है और अनेकानेक उपलब्धियाँ अर्जित की हैंI बहुसंस्कृतिवाद एवं वैश्वीकरण के इस युग में शांति और स्वतंत्रता, समृद्धि एवं विकास किसी एक देश तक सीमित नहीं हैI 

भारत और चीन का स्वतंत्र होना एशिया का उदय थाI एक सौभाग्य था जिसने पूरब को एक सपना दिया- गरीबी, अशिक्षा, बीमारियों और बेरोजगारी का निराकरणI एक ऐसा जगत जहाँ सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक स्तर पर लोकतांत्रिक और समतामूलक संस्थाएं जीवन की परिपूर्णता, समृद्धि और न्याय सुनिश्चित कर सकेंIभारत ने अवसरों को समझा और हमारे पास गिनने के लिए अनेक उपलब्धियाँ हैंI एक नया इतिहास हैI हम तीव्र विकास की राह पर चले और हमने धर्मनिरपेक्ष, समृद्ध, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक देश के निर्माण को सुनिश्चित करने का प्रयास कियाI वर्तमान में हम एक संक्रमण काल से गुजर रहें हैंI संक्रमण काल से मेरा अभिप्राय है पुराने को छोड़ कर नये की तरफ़ जानाI हालांकि इतिहास का प्रत्येक काल एक संक्रमण काल रहा हैI महात्मा बुद्ध का कहना था कि सत् परिवर्तनशील है और कुछ दार्शनिक मानते हैं कि एकमात्र परिवर्तन ही सत् हैI रोचक है कि यह दौर सुकून का एक लम्हा भी मयस्सर नहीं करा रहा हैI

हर सुबह अखबार पढ़ते वक्त रूह काँप जाती है.  इस परिवर्तनशीलता की एक बानगी तो देखिये- उत्तर प्रदेश और बिहार में  बिजली गिरने से सवा सौ मौतें, टिड्डी दल का उत्तर भारत में कोहराम , बंगाल, उड़ीसा और महाराष्ट्र में चक्रवाती तूफान, गाहे बगाहे हर छोटे अन्तराल पर लगातार आने वाला भूकंप, उल्कापिंडों का बार बार  पृथ्वी की कक्षा के समीप से गुजरना, कोविड  19 जैसी महामारी, वैश्विक मंदी, बढ़ती  कीमतें और धार्मिक उन्माद, दिशाहीन भटके हुए बेकार और हताश युवाओं की भीड़ I मुझे नहीं जान पड़ता कि स्वतंत्र भारत में कभी इतनी समस्याएं  एक साथ आयीं हों I भारतऔर चीन जो एक दौर में एशिया के उभरते सितारे थे, जो दुनिया का एक नया इतिहास गढ़ने को तत्पर थे आज  सीमा विवाद में उलझे हुए हैंI यह दोनों एक ऐसे सितारे हैं जिनका अस्त होना एशिया की उम्मीदों का धूमिल होना होगाI

 यह दौर अपने साथ एक घुटन लेकर आया है जहाँ एक अपरिभाष्य बेचैनी है, एक अकथनीय उद्विग्नता हैI हम लोगों में से हर कोई अपने प्रिय जनों के लिए चिंतित और भविष्य के लिए सशंकित हैंI इस खौफ़ को बयान कर पाना मुमकिन भी नहीं है क्योंकि यह कोई 'होलोकॉस्ट' नहीं है, न ही कोई विश्वयुद्ध  है और न ही कोई ऐसी जानी पहचानी जानलेवा बीमारी जहाँ होने वाले नुकसान का अंदाज़ा लगाया जा सकता होI

 विशेष रूप से कोविड 19 एक जिद्दी वायरस प्रतीत होता है जिससे मुकाबला करना किसी वीरता, अदम्य साहस और त्याग का एहसास नहीं कराता हैI कोरोना से लड़ते समय एक कायरता पूर्ण आत्मरक्षा का भाव ही हावी रहता है कि हम इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं कि हम किससे लड़ रहे हैं और दरअसल क्या हो रहा है? 

अभी तक हम उस स्थिति में नहीं पहुंच पाए हैं कि सैद्धान्तिकी के  भारी भरकम आदर्शों का हवाला देकर किसी को दोषी ठहरा सकेंI मजेदार बात यह है कि अब जनता किसी दैवीय चमत्कार की उम्मीद भी नहीं कर रही हैI  जब दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं धराशायी हो रही हों और बेरोजगारी अपने चरम पर हो, जब लोगों की कमाई के जरिये बन्द हो रहें हो तब ताली बजाकर और थाली पीटकर इसका मुकाबला नहीं किया जा सकता हैI कोविड 19 जैसी महामारियाँ मानवता के लिए एक आइने की तरह होतीं हैं जो सरकार और नागरिकों के नैतिक अन्तर्सम्बन्धों को प्रतिबिंबित करतीं हैंI

कोरोना वायरस जो कोविड 19 के लिए जिम्मेदार है वह नवउदारवादी अर्थव्यवस्था की कमियों को भी उजागर करता है जहाँ सरकार का दायित्व मात्र दिशा निर्देश जारी करना भर रह गया है और नागरिकों से उम्मीद की जाती है कि वायरस से बचने और इलाज की जिम्मेदारी वह खुद उठायेगेंI निश्चित रूप से आमजन यह सुनकर सन्तुष्ट नहीं हो सकते हैं कि ' यह वायरस मात्र बुजुर्गों, कुपोषितों और बीमार लोगों के लिए घातक है' और 'आंकड़ों के अनुसार भारत में कोविड से होने वाली मृत्यु दर मात्र 3% है'Iसरकार सिर्फ ऐप लॉन्च करके अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकती है. साथ ही साथ यह भी सनद रहे कि यह लड़ाई सिर्फ सरकार की लड़ाई नहीं है.  ध्यातव्य है कि कोविड 19 से प्रभावित होने वालों में सिर्फ कामगार नहीं हैं जो भूख, प्यास, बीमारी और अनिश्चित भविष्य के डर से महानगरों की सड़कों पर नंगे पैर फटेहाल निकल लिए थे बल्कि सोशल मीडिया पर पर पकवानों और कसरती शरीर की नुमाइश करने वाला आत्म-मुग्ध मध्य वर्ग भी इससे अप्रभावित नहीं हैIअब आर्थिक तंगी और अवसाद से होने वाली आत्महत्याओं की खबरें बढ़ती जा रही हैंI

हमारे लिए आवश्यक है कि हम प्रधानमंत्री जी के संदेश को गंभीरता से लें जिन्होंने आपदा को अवसर में बदलने की बात कही थीI आपदा में अवसर का एक उदाहरण यूरोप में 14 वीं शताब्दी में आई प्लेग की महामारी थी जिसे 'ब्लैक डेथ' की संज्ञा दी जाती हैIएक अनुमान के मुताबिक़ इसमें लाखों लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था लेकिन इस घटना ने यूरोप की सरकारों पर से चर्च के प्रभाव को कम किया और एक नये युग की शुरुआत हुईI समसामयिक भारत में हम उम्मीद कर सकते हैं कि सार्थक चयन विज्ञान और तकनीकी में निवेश करना है ना कि धार्मिक अनुष्ठानों का अन्धानुकरणI विज्ञान और तकनीकी में निवेश के द्वारा ही हम उम्मीद कर सकते हैं कि यह समस्याएं एक दिन ख़त्म होगीं और जिन्दगी पुराने ढर्रे पर लौटेगीI तब एक बार फिर  पार्क बच्चों की किलकारियों से गुंजायमान होगें और प्रेमी युगल महानगरीय आपाधापी में अपने लिए एक स्पेस खोज पायेगेंI तभी जूम, व्हाट्सअप, गूगल मीट और फेसबुक लाइव आदि तमाम माध्यम छोड़ कर विद्यार्थी सीधे शिक्षक से संपर्क कर पाएंगेI तभी महाभिनिष्क्रमण में जिन्दा बचे श्रमिक फिर अपने काम पर लौटेंगे और फिर से एक खुशहाल जीवन का सपना देखने का साहस कर सकेंगेIदुष्यन्त कुमार के शब्दों में हमारे लिए कल्पनाओं के सब आश्रय खुले हुए हैं अगर यह व्यवस्था देश के युवाओं को झकझोर नहीं रही है तो आज देश मे ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो सोई हुई व्यवस्था को झकझोर सकें।

 

*लेखक रामजस कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में दर्शन शास्त्र के प्रवक्ता हैं. यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं

 

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