आठ पुलिसकर्मियों की हत्या , अमानवीयता एवं बर्बरता की पराकाष्ठा

विकास दुबे के एनकाउंटर पर तमाम राजनीतिक दल हाय-तौबा मचा रहे हैं, बुद्धिजीवी बहस कर रहे हैं, क़ानून के जानकार सिर धुन रहे हैं और मीडियाकर्मी सवाल उछाल रहे हैं| जिस नृशंसता एवं क्रूरता से विकास दुबे और उसके साथियों

विकास दुबे के एनकाउंटर पर तमाम राजनीतिक दल हाय-तौबा मचा रहे हैं, बुद्धिजीवी बहस कर रहे हैं, क़ानून के जानकार सिर धुन रहे हैं और मीडियाकर्मी सवाल उछाल रहे हैं| जिस नृशंसता एवं क्रूरता से विकास दुबे और उसके साथियों ने आठ पुलिसकर्मियों की हत्या की, वह अमानवीयता एवं बर्बरता की पराकाष्ठा थी| ऐसा भी नहीं था कि यह पहली वारदात थी, जिसे उसने अंजाम दिया था, बल्कि इससे पूर्व भी उसने अनेकानेक जघन्य अपराध एवं बर्बर हत्याओं को अंजाम दिया था| आश्चर्य है कि उसके एनकाउंटर ने उन अनगिनत अपराधों को नेपथ्य में धकेल दिया| दूसरी ओर बड़े-से-बड़े अपराधियों को दंडित करने के न्यायसंगत तरीकों पर चतुर्दिक विमर्श हमारी सामाजिक जागरूकता का भी प्रमाण है| लोकतंत्र में मनमानी करने की छूट सरकार, सिस्टम या पुलिस- किसी को भी नहीं दी जा सकती| क़ानून को निर्बाध अपना काम करने देना चाहिए| अधिकारों का अनुचित एवं निरंकुश प्रयोग अराजकता के व्याकरण गढ़ता और स्थापित करता है| और कोई भी सभ्य समाज अराजकता की भाषा नहीं बोलता, न उसकी पैरवी करता है| आदर्श तो यही है कि व्यवस्था के सभी घटक अपनी-अपनी मर्यादाओं का पालन करें और उसके भीतर रहकर ही काम करें| क्योंकि केवल मर्यादाओं का पालन ही समाज के लिए आदर्श नहीं बनता, अपितु कई बार मर्यादा का उल्लंघन भी मिसाल के तौर पर देखा-सराहा जाने लगता है|

 

पर इन सब चर्चाओं के बीच हम कुछ बड़े सवालों और सरोकारों की जाने-अनजाने अनदेखी कर रहे हैं| जब समाज का बड़ा तबका ऐसे तात्कालिक न्याय पर जश्न मनाने लगे तो सचमुच उसके कुछ गहरे निहितार्थ निकलते हैं| क्या हमारा न्याय-तंत्र खोखला हो चला है? क्या उस पर से लोगों का विश्वास उठ चला है? क्या विलंब से मिलने वाले न्याय के कारण आम लोगों का धैर्य चुक गया है? क्या व्यवस्था के छिद्रों का लाभ उठाने वाले रसूखदारों के कारण आम लोगों की यह धारणा बन चुकी है कि न्याय भी भेदभाव करती है, कि न्याय भी सबके लिए समान और सुलभ नहीं है? क्या दोषियों को दंड और निर्दोषों को न्याय देने में हमारा न्याय-तंत्र विफल रहा है? आँकड़े भी इसी तरह की गवाही देते हैं| आँकड़े बताते हैं कि लगभग साढ़े तीन करोड़ मुक़दमे विभिन्न अदालतों में लंबित हैं| जहाँ चीन में 99.9, अमेरिका में 68, ब्रिटेन में 80, इजरायल में 88 प्रतिशत मामलों में न्याय मिल पाता है, वहीं भारत में न्याय मिलने का औसत दर मात्र 40 प्रतिशत ही है| बल्कि यौन उत्पीड़न के मामलों में न्याय मिल पाने का दर तो मात्र 18 प्रतिशत ही है|(स्रोत-जी न्यूज़) दोषियों को सज़ा और निर्दोषों को न्याय देने के मामले में हमारा देश विश्व में सत्तरवें स्थान पर आता है| और यही कारण है कि चाहे वह हैदराबाद का एनकाउंटर हो, चाहे कानपुर , चाहे देश के किसी अन्य हिस्से का, हर एनकाउंटर के पश्चात आम जनता में जश्न का माहौल होता है और हर सरकार एवं पुलिस-विभाग इसे अपनी बड़ी क़ामयाबी के रूप में प्रचारित करती है| सरकारें तो इसे चुनावों में भी भुनाती हैं| जबकि सत्य यह है कि ये अपराधी बिना राजनीतिक एवं व्यवस्थागत संरक्षण के फल-फूल ही नहीं सकते| ऐसे एनकाउंटरों से कई सफ़ेदपोश चेहरे बेनक़ाब होने से बच जाते हैं| राजनीति की बिसात पर 'मोहरे' बदलते रहते हैं, प्यादा वज़ीर और वज़ीर राजा बनने की हसरत में ठिकाने लगाए जाते रहते हैं| और जो बच जाते हैं वे 'बाहुबली' विशेषण के साथ इस या उस दल की नैय्या पार लगाने की सरेआम 'सौदेबाज़ी' करते रहते हैं|

 

जिन्हें राजनीति करनी है उनके लिए तो हर वारदात या घटना भी एक अवसर की तरह होती है| वे उस वारदात या घटना को भुनाने की हर संभव कोशिश करते ही करते हैं| वे भले ही निहित स्वार्थों की पूर्त्ति के लिए अपराध और अपराधियों को समान रूप से खाद-पानी देने का काम करते हों पर उसके पापों का घड़ा एक-दूसरे पर फोड़ने का कोई अवसर नहीं छोड़ते| राजनीतिक दलों की ये प्रवृत्तियाँ इतनी आम है कि अब लोगों ने उनकी टिप्पणियों को गंभीरता से लेना बंद कर दिया है| पर उससे बड़ी चिंता अपराधियों का जातीयकरण है| पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि विभिन्न जातियों के अपने-अपने अपराधी-नायक हैं| अपराधियों में नायकत्व की छवि तलाशना सभ्य समाज के पतन की पराकाष्ठा है| जब सामाजिक आदर्श छीजने लगे, स्वार्थ हावी होने लगे, समाज में जातीय विभाजन की खाई गहरी होती चली जाय, तभी ऐसा संभव है| जब किसी अपराधी को जातीय-गौरव का प्रतीक-पर्याय बना दिया जाता है तो उसकी सज़ा आने वाली पीढ़ियाँ भुगतती हैं| कालांतर में या तो उन्हें उस पहचान-प्रतीक से बेमतलब जोड़ दिया जाता है या युवा-अपरिपक्व मन उन अपराधियों-जैसा बनकर नाम कमाने की वैसी ही हसरतें पालने लगता है| ठीक उसी तर्ज़ पर कि बदनाम भी हुए तो नाम नहीं हुआ क्या! रातों-रात अमीर बनने, येन-केन-प्रकारेण सुर्खियाँ बटोरने की ख़्वाहिश आग में घी का काम करती है| और कोढ़ में खाज यह कि कला के नाम पर ऐसे खल पात्रों को सबसे लोकप्रिय जनसंचार माध्यम सिनेमा नायक की भाँति प्रस्तुत कर महिमामंडित करता रहता है| समय आ गया है कि हम एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने, इसे या उसे दोषी ठहराने से अधिक इन सवालों और सरोकारों पर गहन चिंतन करें और समाधान के लिए सार्थक एवं ठोस पहल करें| हमें अपनी संततियों, किशोरों-युवाओं को समझाना होगा कि अपराधियों की कोई जाति, मज़हब या ईमान नहीं होता, कि अपराध ही उनकी जाति, उनका मज़हब, उनका ईमान है, कि पैसा-पॉवर ही उनका माई-बाप, उनका ख़ुदा है| 

 

समाज में बढ़ते अपराध और अपराधियों के फलते-फूलते साम्राज्य पर अंकुश लगाने के लिए हमें अपनी न्यायिक व्यवस्था में भी आमूल-चूल सुधार करना होगा| अनावश्यक विलंब को टालकर समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करना होगा| ट्रिब्यूनल, फ़ास्ट ट्रैक, लोक-अदालत, ग्राम्य न्यायालय आदि का गठन कर लंबित मामलों का प्राथमिकता के आधार पर निस्तारण करना होगा| अपील और तारीख़ों की संख्या निश्चित करनी होगी और अपराध की प्रकृति के आधार पर ज़मानत की प्रक्रिया को अपेक्षाकृत सरल या जटिल बनाना होगा| न्यायाधीशों और न्यायालयों की संख्या बढ़ानी होगी, न्याय-तंत्र में व्याप्त भ्र्ष्टाचार को दूर करना होगा, जजों की भी जवाबदेही तय करनी होगी, नियुक्ति से लेकर निर्णय तक पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी, विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका के बीच बेहतर ताल-मेल स्थापित करना होगा और इन सबसे अधिक जन-जागृति एवं जन-भागीदारी को प्रोत्साहित कर न्याय-तंत्र पर आम नागरिकों के विश्वास को पुनः बहाल करना होगा|

प्रणय कुमार

गोटन, राजस्थान

9588225950

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