समाज के नैतिक पतन का प्रतीक है यौन शोषण की बढ़ती घटनाएं

 संस्कार,संस्कृति,चरित्र और सदाचार की बढ़ चढ़ कर बातें करने वाले भारत वर्ष में लड़कियों के यौन शोषण की बढ़ती घटनाओं ने पूरे देश को शर्मिंदा कर दिया है। जिस देश में भगवान व पिता तुल्य 'गुरु' ही अपनी शिष्याओं या अपने

 

निर्मल रानी                                      

 

 संस्कार,संस्कृति,चरित्र और सदाचार की बढ़ चढ़ कर बातें करने वाले भारत वर्ष में लड़कियों के यौन शोषण की बढ़ती घटनाओं ने पूरे देश को शर्मिंदा कर दिया है। जिस देश में भगवान व पिता तुल्य 'गुरु' ही अपनी शिष्याओं या अपने भक्तों की बहन बेटियों का शारीरिक शोषण करने पर उतारू हों वहां समाज के किसी दूसरे वर्ग से सदाचार या चरित्र की क्या उम्मीद रखी जा सकती है। परन्तु इस बात पर आश्चर्य ज़रूर होता है कि आसाराम से लेकर चिन्मयानंद तक की पोल पट्टी खुलने के बाद तथा इसी तरह की और भी अनेक घटनाओं का ख़ुलासा होने के बावजूद ऐसे समाचारों पर विराम क्यों नहीं लग रहा। यद् कीजिये जून 2018 में बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर शहर की वह घटना जिसमें पत्रकार के चोले में लिपटे ब्रजेश ठाकुर नामक एक सफ़ेद पोश व्यक्ति द्वारा बिहार राज्य समाज कल्याण विभाग की ओर से संचालित एक शेल्टर होम में 30 से ज्यादा लड़कियों के साथ यौन शोषण का मामला सामने आया था। इस मामले के 20 आरोपियों में से 19 को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई गयी थी। अदालत ने मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस मामले में मंत्री स्तर के प्रभावशाली लोगों के शामिल होने की ख़बरें सामने आई थीं।

                                            इस के बाद अगस्त 2018 में ही उत्तर प्रदेश के देवरिया के बालिका संरक्षण केंद्र की 42 में से 18 लड़कियों के लापता होने की तथा कई लड़कियों के यौन शोषण का मामला भी उजागर हुआ था। इसी तरह गत जून माह में कानपुर के राजकीय महिला संवासिनी गृह की 57 बालिकाओं के कोरोना संक्रमित मिलने और सात के गर्भवती पाए जाने तथा इनमें कुछ नाबालिग लड़कियों के गर्भवती होने का ख़ुलासा हुआ।  इनमें एक एड्स से भी पीड़ित है। प्रशासन द्वारा इस केंद्र में कोरोना की जांच कराई गई थी, जिसके बाद ये सनसनीख़ेज़ मामले सामने आए। लड़कियों के साथ निरंतर होने वाले यौन शोषण के संगीन मामलों से पर्दा हटने के बावजूद इस अनैतिक 'व्यवसाय ' का अंत होता नज़र नहीं आता बल्कि इस तरह की घटनाएँ बढ़ती ही जा रही हैं। आए दिन कहीं न कहीं से लड़कियों के सामूहिक यौन शोषण के समाचार आते ही रहते हैं। और ऐसी अधिकांश  घटनाओं में सफ़ेद पोश व रसूख़दार लोग शामिल रहते हैं।

                                      इसी तरह की एक और दिल दहलाने वाली घटना उत्तर प्रदेश के ही धार्मिक नगर  चित्रकूट से आई जहाँ ग़रीब आदिवासी परिवारों की बच्चियों से अवैध खदानों में मज़दूरी का काम दिए जाने के बदले  में उनका शारीरिक शोषण किये जाने का मामला सामने आया। ख़बरों के अनुसार, चित्रकूट में 12 से लेकर 14 वर्ष तक की बच्चियां अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए अवैध खदानों में काम करने को मजबूर हैं। परन्तु  इन बच्चियों से यहां मज़दूरी के साथ ही कथित तौर पर 200 से 300 रुपये में जिस्मफ़रोशी भी कराई जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार खदानों में बच्चियों के काम करने के बावजूद इन्हें दिहाड़ी नहीं दी जाती, इसके लिए इन बच्चियों से जिस्मफ़रोशी कराई जाती है। एक पीड़िता के अनुसार -'जब वे इन खदानों में काम मांगने जाती हैं तो ठेकेदार जिस्मफ़रोशी की शर्त पर इन्हें काम देने को कहते हैं। जबकि एक अन्य पीड़िता के मुताबिक़ -“ठेकेदारों ने खदानों के पास के टीले के पीछे बिस्तर लगा रखे हैं। वो हमें वहां ले जाते हैं, और बारी-बारी से हमारा यौन शोषण करते हैं। हमें वहां एक-एक करके जाना होता है। जब हम मना करते हैं, तो वो हमें पीटते हैं। दर्द होता है, लेकिन सह लेते हैं। हम और कर भी क्या सकते हैं। दुख़ होता है। फिर मरने का या यहां से भाग जाने का सोचते हैं।” चित्रकूट के ही दफ़ाई गांव की एक पीड़िता ने बताया कि - ‘हमें धमकाया जाता है कि अगर हमें काम चाहिए तो हमें इनकी शर्तें माननी पड़ेंगी।कई बार तो एक से अधिक आदमी हमारा उत्पीड़न करता है। अगर हम न कह दें तो हमें उठाकर बाहर करने की धमकी दी जाती है।’

                                                               अपनी बच्चियों के साथ होने वाले इस अत्याचार से इन बच्चियों के माता-पिता भली भांति परिचित हैं। एक पीड़िता की मां कहती हैं, ‘हम बेबस हैं। उन्होंने हमें दिन का 300 से 400 रुपये देने का वादा किया है लेकिन कभी-कभी वे हमें 150 से 200 रुपये देते हैं। जब हमारे बच्चे काम से घर लौटते हैं तो अपनी आपबीती बताते हैं लेकिन हम क्या कर सकते हैं? हम मज़दूर हैं, हमें अपना परिवार चलाना है। मेरे पति बीमार हैं और उन्हें इलाज की ज़रूत है।’ यह उस प्रदेश की भूखमरी व ग़रीबी की दास्तां है जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी 26 जून को ही ‘आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश रोज़गार अभियान’ कार्यक्रम की शुरुआत में योगी सरकार की प्रशंसा करते हुए कहा था, “लॉकडाउन के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने 15 करोड़ ग़रीबों को भोजन उपलब्ध कराया। इतना ही नहीं, राज्य की सवा तीन करोड़ ग़रीब महिलाओं को जन धन खाते में लगभग 5 हज़ार करोड़ रुपये भी ट्रांसफ़र किए गए। आज़ादी के बाद संभवत: पहली बार किसी सरकार ने इतने बड़े पैमाने पर मदद की है।' यदि प्रधानमंत्री के यह आंकड़े धरातल पर उतरे होते तो शायद चित्रकूट में भूख के बदले जिस्म नीलाम करने जैसी शर्मनाक घटना सामने न आती। दरअसल उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की योगी सरकार 2017 से सत्ता में है लेकिन क़ानून-व्यवस्था के अन्य मोर्चों के साथ ही सरकार महिला सुरक्षा के मुद्दे पर पूरी तरह नाकाम रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की सालाना  रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में महिलाओं के प्रति अपराध पूरे देश में सबसे ज़्यादा हैं।

                                                            पिछले दिनों एक और मामला भोपाल के एक स्थानीय पत्रकार से संबंधित सुनाई दिया। पत्रकारिता की आड़ में इस व्यक्ति ने काफ़ी ज़मीन जायदाद पर क़ब्ज़ा कर रखा था। यह मैरिज पैलेस आदि कई कारोबार कर रहा था। इसने भी अनेक लड़कियां नौकरी पर रखी थीं। हद तो यह कि इसने कई लड़कियों को गोद लेकर बेटी बनाने का पाखंड भी रचा था और उन बच्चियों का भी शारीरिक शोषण करता व कराता था।इन्हें यह 'पार्टियों' में भी सप्लाई करता था। सोचा जा सकता है कि पत्रकारिता की आड़ में वह किस तरह के सफ़ेद पॉश लोगों को लड़कियां भेजता रहा होगा। हमारे देश में अब तक किसी भी धर्म का कथित धर्म गुरु, किसी विभाग या स्तम्भ के अधिकारी या कर्मचारी,या किसी भी दल के नेता या किसी वर्ग या स्तर के लोग शेष नहीं बचे जो लड़कियों के यौन शोषण जैसे घिनौने अपराध में शामिल न हों। निश्चित रूप से हमारे देश में यौन शोषण की बढ़ती व अनियंत्रित घटनाएं समाज के नैतिक पतन का प्रतीक हैं।

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