सगीर साहब का यूं चले जाना....

मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि 27 सितंबर को जब मेरी मोबाइल की घंटी बजी वह हम लोगों को तोड़कर रख देगी। फोन उठाते ही सगीर साहब के नहीं होने की सूचना मिली।

 

शिवकुमार राय

मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि 27 सितंबर को जब मेरी मोबाइल की घंटी बजी वह हम लोगों को तोड़कर रख देगी। फोन उठाते ही सगीर साहब के नहीं होने की सूचना मिली। दिल आंसुओं से भर गया। मन बिचलित हो बैठा। समझ से परे था कि अब क्या करें। मेरे हमदम, मेरे पथप्रदर्शक, सबसे अजीज मित्र या यों कहें कि एक संरक्षक का साया मेरे सिर से उठ चुका था। मैं स्तव्ध था, मैं विवेक शून्य था कि तभी मेरे फोन की फिर घंटी बजी और मेरे एक परिचित का फोन आया और उसने भी सगीर साहब के नहीं रहने की सूचना दी। अब तो ऐसा लग रहा था कि मुझे तो अब उनके पास होना चाहिए पर मैं उनके काफी दूर था। 16 घंटे की दूरी पर पर समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे चलूं पर यहीं से ही प्रार्थना कर रहा  था कि सगीर साहब को ईश्वर अपने श्रीचरणों से जगह दें। उन्हें जन्नत बख्शे।

हमारी मित्रता कोई एक दो साल पुरानी नहीं बल्कि वर्षों की थी। एक एक पल की खुशी और गम के साक्षात्कार मेरी स्मृतियों में घूम रहे थे, आंखों भी छलक जा रही थी। आज वह भी सगीर साहब के लिए अपनी श्रद्धांजलि दे रही थीं।

मैं किसी तरह अपने दरख्त से उठा तो लगा कि समाजवाद का एक पुरोधा चला गया जिसके सिर्फ जुबान में ही नहीं बल्कि जिनकी नसों में भी वह खून बनकर दौड़ता था। सगीर साहब किसी संगठन के मोहताज नहीं बल्कि जो खुद संगठक थे। जो रिश्ते बनाना ही नहीं बल्कि उसे निभाना भी जानते थे। जिनके दिल में सबके लिए अदब होता था। जिनकी मेहमानबाजी हर कोई को अपना मुरीद बना लेती थी।

 

 

 

सगीर साहब का इस तरह अचानक जाने की खबर मुझे स्तब्ध कर दी। यूं तो यह ईश्वरीय नियम है। जो आया है, वह जाएगा लेकिन मुझे कचोट रहा है और शायद जीवनभर यह सवाल कचोटता रहेगा कि मैं उनके आखिरी वक्त का गवाह क्यों नहीं बन पाया। उनके आखिरी सफर में दो कदम चलकर उन्हें कंधा क्यों नहीं दे पाया। आखिर इसके जवाब के लिए मैं किसे कोसूं। खुद के नसीब को कि मुआं हालात को।

 

सगीर साहब से फोन पर बात हुई थी। अपनों के लिए वही गर्मजोशी थी। अपनों की खैरियत जानने की वही आकुलता थी और थी अपनों तक पहुंचने की योजना। पहले लखनऊ पहुंचा जाएगा। वहां गोरखपुर से सरदार देवेंदर सिंह आ जाएंगे। फिर राजनाथ शर्मा से मिलने इस बार बाराबंकी चलना है। उनके कॉलेज पर चला जाएगा।

...दर पर श्रद्धांजलि अभी बाकी

सगीर साहब के लिए कैसे चलना है। सरदार देवेंदर सिंह से बात हुई है। बलिया से वीरेंद्र राय भी साथ चलने को तैयार हैं। रामनाथ ठाकुर भी चलने को उत्सुक हैं। यही कि हम सब उनकी देहरी पर पहुंचकर उन्हें अपना श्रद्धासुमन अर्पित करें। मुझे एक गरज यह भी सुझती है कि कोई सगीर साहब का संदर्भ मिल जाए। जिसमें सगीर साहब के वंशज हों। नात-रिश्तेदार रहें। उनके और भी हर दिल अजीज की मौजूदगी हों। ताकि हम सब भी उनके संग सगीर साहब की मधुर, सुनहली यादों को और ठीक से बटोर पाएं।       

...बस अब सगीर साहब की दर पहुंचने पर।....सगीर साहब आपको शत-शत नमन।

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राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस

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