मशहूर सोशलिस्ट रहनुमा नेता सग़ीर साहब अब हमारे बीच नहीं रहे

मशहूर सोशलिस्ट रहनुमा नेता और साबिक़ वज़ीरे आज़म चंद्रशेखर के बेहद क़रीबी दोस्त सय्यद सग़ीर अहमद  साहब का आज सवेरे बरेली के एक अस्पताल में इंतेक़ाल हो गया।

कुरबान अली

मशहूर सोशलिस्ट रहनुमा नेता और साबिक़ वज़ीरे आज़म चंद्रशेखर के बेहद क़रीबी दोस्त सय्यद सग़ीर अहमद  साहब का आज सवेरे बरेली के एक अस्पताल में इंतेक़ाल हो गया।उनकी उम्र 86 बरस थी। सग़ीर साहब बदायूँ ज़िले के क़स्बा सहसवान में एक सुन्नी सय्यद नक़वी खानदान में 4 दिसंबर 1934 को पैदा हुए थे। शुरूआती तालीम के बाद वो आला तालीम के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी गए मगर इस दरम्यान सोशलिस्टों के चंगुल में ऐसे फंसे के ज़िन्दगी भर उससे निकल ही नहीं पाए और सोशलिस्ट होकर रह गए। न केवल विचार से बल्कि आचरण से भी। मरहूम रियासत हुसैन साहब कहा  करते थे कि "1953 में जब मैं प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में  शामिल हुआ तो पार्टी के एक जलसे में देखा कि मंच पर एक दुबला पतला, ख़ूबसूरत नौजवान शेरवानी पहने बैठा हुआ है और  हम नीचे फ़र्श पर। ये नौजवान सग़ीर अहमद थे।"  अपने बारे में ख़ुद सग़ीर साहब बताते हैं कि "देश आज़ाद हो जाने के बाद सन 1952 में पहले आम चुनाव हुए। इन चुनावों में मैंने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और 1953 में हुए नगर पालिका चुनावों में खूब भाषण दिए। इसी दौरान मैं प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का सक्रिय सदस्य  बन गया और नवंबर 1953 में उन्नाव में हुए पार्टी की युवा शाखा, समाजवादी युवक सभा  के  पहले प्रांतीय सम्मेलन में शिरकत की। इसी सम्मेलन में जयप्रकाश नारायण से  मुलाक़ात हुई। इसी साल दिसंबर 1953 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का पहला  राष्ट्रीय सम्मेलन इलाहबाद में हुआ जिसमें आचार्य जे बी कृपलानी को पार्टी का अध्यक्ष और डा. राममनोहर लोहिया को जेनरल सेक्रेटरी चुना गया। इस सम्मेलन के बाद देहरादून में पार्टी का एक कैंप हुआ जिसमें तय किया गया कि मैं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाख़िला लूं, जहां सोशलिस्ट पार्टी बहुत कमज़ोर थी। 1954 में बदायूं ज़िले में एक उपचुनाव हुआ। इस उपचुनाव में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया चुनाव प्रचार के लिए आए और सभी साहब से उनकी मुलाक़ात हुई। 1955 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में विभाजन की प्रक्रिया शुरू हो गई। पहले डॉक्टर लोहिया तथा मधु लिमये को प्रसोपा से निष्कासित किया गया। नतीजे में डॉक्टर लोहिया ने अपने समर्थकों के साथ 1 जनवरी 1956 को हैदराबाद में सोशलिस्ट पार्टी का पुनर्गठन कर लिया।" सग़ीर साहब इस बीच गेंदा सिंह, बाबू त्रिलोकी सिंह, डॉक्टर ए.जे. फ़रीदी, नारायण दत्त तिवारी और चंद्रशेखर जी वग़ैरह के काफी नजदीक आ गए थे। लिहाज़ा वो इन लोगों के साथ प्रसोपा में ही बने रहें।

1957 के विधान सभा चुनावों में सग़ीर साहब ने प्रसोपा उम्मीदवारों के लिए चुनाव प्रचार किया और इन चुनावों के बाद ही उत्तर प्रदेश प्रसोपा ने महंगाई के ख़िलाफ़ जो खाद्य आंदोलन चलाया तो सग़ीर साहब उसमें शरीक़ हुए और जेल गए।

 

 

 

1957 से लेकर 1967 तक का दौर सग़ीर साहब के लिए सियासी तौर पर काफ़ी अहम साबित हुआ। वो कई बड़े सियासी लीडरों के बेहद क़रीब आए। इनमें गेंदा सिंह, चंद्रशेखर, नारायण दत्त तिवारी और श्रीमति सुचेता कृपलानी के नाम क़ाबिले-ज़िक्र हैं। 1962 के आम चुनावों में प्रसोपा को काफ़ी बड़ा झटका लगा और बकौल सग़ीर साहब उत्तर प्रदेश में प्रमुख विपक्षी दल की जगह जनसंघ ने ले ली और प्रसोपा तीसरे नंबर पर चली गई। पार्टी के अध्यक्ष अशोक मेहता देवरिया से चुनाव हार गए। नारायण दत्त तिवारी, जो 1952 और 1957 के आम चुनावों में प्रसोपा टिकट पर जीते थे, 1962 में हार गए और अमरीका चले गए। इससे प्रसोपा में मायूसी काफ़ी बढ़ गई, जिसका नतीजा ये हुआ कि 1964 में प्रसोपा का एक बड़ा गुट अशोक मेहता, एमएस गुरुपदस्वामी, चंद्रशेखऱ, गेंदा सिंह, नारायण दत्त तिवारी, वसंत साठे वग़ैरह कांग्रेस में शामिल हो गए। सग़ीर साहब भी उनके साथ रहे और ये उनके कांग्रेसी जीवन की शुरुआत थी।

 

 

 

अक्टूबर 1963 में श्रीमति सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। प्रसोपा नेताओं के कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्होंने इन लोगों की काफ़ी मदद की क्योंकि वे ख़ुद एक समय में प्रसोपा में रह चुकी थीं और उनके पति आचार्य जेबी कृपलानी प्रसोपा के अध्यक्ष रहे थे। सग़ीर साहब के गुरु बाबू गेंदा सिंह सुचेता मंत्रीमंडल में मंत्री बनाए गए और सग़ीर साहब को बदायूं ज़िला यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। इससे पहले 1962 में सग़ीर साहब के अज़ीज़ दोस्त चंद्रशेखर प्रसोपा से ही राज्य सभा के लिए चुन लिए गए थे। लिहाज़ा उनका एक ठिकाना अब दिल्ली में भी हो गया था।

 

 

 

1964 से 1974 के दौरान सग़ीर साहब दिल्ली और लखनऊ के अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी काफ़ी सक्रिय रहे और यहीं गोरखपुर के सरदार देवेन्द्र सिंह से उनकी दोस्ती हुई जो आज भी क़ायम है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में उनके दोस्तों में पूर्व राज्यपाल, सांसद और मंत्री सुखदेव प्रसाद, पूर्व सांसद गौरीशंकर राय, पूर्व विधायक पद्माकर लाल श्रीवास्तव, मैनेजर सिंह और रफ़ीउल्लाह के नाम क़ाबिले ज़िक्र हैं। 1974-1975 में जब जेपी आंदोलन शुरू हुआ तो सग़ीर साहब के दोस्त और उस समय के प्रमुख कांग्रेस नेता चंद्रशेखर ने जेपी और इंदिरा गांधी में समझौता कराने की कोशिश की जो नहीं हो सका। इसका राजनितिक रूप से काफ़ी नुकसान चंद्रशेखर जी को उठाना पड़ा और 25 जून 1975 को जब देश में आपातकाल लगाया गया तो चंद्रशेखर जी गिरफ़्तार कर लिए गए और उन्हें पहले रोहतक और फिर पटियाला जेल में रखा गया। इस बीच सग़ीर साहब चंद्रशेखर जी के परिवार की बराबर देखभाल करते रहे।

 

 

 

चंद्रशेखर जी ने अपनी जेल डायरी में कई जगह सग़ीर साहब को बहुत ही मार्मिक ढंग से याद किया है। 8 अगस्त 1975 को वे लिखते हैं, “आज मौलाना (सग़ीर) की याद बार-बार आई। पता नहीं बेचारे का क्या हाल है? कितना लगाव है उसके मन में। समझदार है पर है बड़ा भावुक। पता नहीं उस पर क्या गुजरी होगी? नाज़ुक आदमी ठहरा। पहले शादी नहीं की। हम लोगों ने उसकी जान आफ़त में डाल दी। जबसे उसने शादी कर ली, कभी चैन ही नहीं मिला। सारी कोशिशें बेकार गईं। चुनावों (1974) में कुछ मामला जमता सा नज़र आया मगर हमारे वज़ीरे आला के कारण सारा गुड़ गोबर हो गया। ऐसा लगता है कि मुक़द्दर कोई चीज़ है। नहीं तो जिनकी मदद करो वही लोग हमलोगों से बेवफ़ाई क्यों कर जाते हैं? फिर भी कुछ दम हैं इन दोस्तों में। पामाली आती है। बेमिसाल मुसीबतों का सामना करना पड़ता है, पर फिर ज्यों ही मौक़ा आता है उठ खड़े होते हैं। आज-कल सरदार (देवेन्द्र) की भी हालत नाज़ुक होगी। जोश में बड़े-बड़े मंसूबे दिखा जाता है, पर आज-कल तो कोई गुंजाइश ही नहीं। केवल मोटर चलाने से उसका जी भरता नहीं होगा, कुछ शगल भी चाहिए। वह सब बंद...

 

 

 

यहाँ ये उल्लेख करना ज़रूरी है की 1974 में उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभा चुनावों के लिए कांग्रेस पार्टी की ओर से सगीर साहब को टिकट मिलना लगभग तय था  लेकिन ऐन वक़्त पर तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने चंद्रशेखर जी से ये कहकर उनका टिकट काट दिया कि "सग़ीर शरीफ आदमी है। चुनाव लड़ना उसके बस की बात नहीं। हम उन्हें एमएलसी बना देंगें।"  बहुगुणा जी बाद में अपने इस वायदे से मुकर गए। जेल डायरी में  चंद्रशेखर जी ने इसी घटना का उल्लेख किया है। 

 

  

 

आपातकाल ख़त्म होने के बाद 1977 में चंद्रशेखर जी बलिया से लोकसभा का चुनाव लड़े और चुने गए। साथ ही 1 मई 1977 को जनता पार्टी के अध्यक्ष भी बना दिए गए।1981 में जब कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया उत्तर प्रदेश जनता पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए तो सग़ीर साहब को उत्तर प्रदेश जनता पार्टी का महामंत्री बनाया गया। 1981 से 1985 के दौरान सग़ीर साहब ने उत्तर प्रदेश जनता पार्टी की तरफ़ से कई अल्पसंख्यक सम्मेलन आयोजित कराए और 1983 में जब चंद्रशेखर जी ने कन्याकुमारी से लेकर दिल्ली तक की पदयात्रा की तो सग़ीर साहब ने उस पदयात्रा को क़ामयाब बनाने के लिए ग़ाज़ियाबाद में एक दफ़्तर खोलकर बहुत काम किया। इसी पदयात्रा के दौरान चंद्रशेखर जी ने सग़ीर साहब को मध्य प्रदेश के शिवपुरी से एक बहुत ही मार्मिक ख़त लिखा जिसे लेकर उस समय के मशहूर पत्रकार उदयन शर्मा और बाद में सांसद बने केसी त्यागी  उस खत को लेकर ग़ाज़ियाबाद आए थे।

 

 

 

पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर जी द्वारा अपनी भारत यात्रा के दौरान  सगीर साहब को लिखा गया खत

 

 

 

अपने इस में वे लिखते हैं:

 

शिवपुरी 2.6.83

 

प्रिय सग़ीर,                                                                 

 

कठिनाई के हर ऐसे मौके पर तुम अपनी हिम्मत का इज़हार करते हो, न सेहत रास्ते में हायल होती है और न आरामतलबी की आदत तुम्हें रोक पाती है। मुझे जानकर अज़हद  खुशी हुई कि तुम गााजियाबाद में डटे हो।

 

हम लोग तो चल ही रहे हैं-दिक्कतें हैं, पर पुर लुत्फ़ है यह अहसास भी। लोगों की मुहब्बत, उनकी निगाहों में उम्मीद भरी दिलचस्पी और मुल्क के मुस्तक़बिल को बनाने के लिए उनके चेहरों में झलकते अरमान, काफी हैं हमें चलते रहने के लिए। कौन ऐसा इन्सान होगा जो इन सबसे मुत्तसिर हुए बिना रह सके। कभी कभी सोचता हूं कि इस जिन्दगी में शायद इन लोगों को फिर न देख सकूं पर जिन जज़्बातों का इज़हार इनकी निगाहों में है, उन्हें भुला पाना नामुमकिन है। इस बात से कभी कभी अजीब उदासी मन में छा जाती है, कौन जाने हम इनके लिए कुछ कर पायेंगे या नहीं। पर हमें कोशिश जारी रखनी होगी। इस कोशिश में तुम जैसे साथियों की मुहब्बत ही हमारी मिल्कियत है। यही एक सहारा है। सब मिल के चलें, मंजिल की ओर दो कदम भी बढ़ सकें तो कुछ कम नहीं।

 

माना कि हम चमन को न गुलज़ार कर सके

 

कुछ खार कम तो सके गुज़रे जिधर से हम।

 

 

 

खुदा हाफ़िज, इन्शा अल्ला जल्द ही मिलेंगे। सबको सलाम,

 

तुम्हारा

 

चन्द्रशेखर

 

 

 

लेकिन इस पदयात्रा के बाद कुछ लोगों ने चंद्रशेखर और सग़ीर साहब के बीच कुछ ऐसी ग़लतफ़हमियां पैदा कर दीं जो कभी दूर न हो सकीं और सग़ीर साहब को सियासी तौर पर उसका काफ़ी नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन आख़िरी वक़्त तक सग़ीर साहब के लिए चंद्रशेखर जी के दिल में जो आदर और सम्मान था वह क़ायम रहा। इस पदयात्रा के बाद सग़ीर साहब ने अगस्त 1983 में लखनऊ के अमीनाबाद पार्क स्थित गंगा प्रसाद मेमोरियल हॉल में उत्तर प्रदेश जनता पार्टी की ओर से एक बड़ा अल्पसंख्यक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें चंद्रशेखर जी के अलावा राजनारायण जी, कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया, बाबू बनारसी दास, सुरेन्द्र मोहन, सैय्यद शहाबुद्दीन, डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी और यशवंत सिन्हा समेत बहुत से लोगों ने शिरकत की। मरहूम रियासत हुसैन साहब और कैप्टन अब्बास अली साहब ने इस सम्मेलन का बारी-बारी से संचालन किया।

 

अक्टूबर 1984 में प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और उसके बाद लोकसभा चुनाव कराए गए। इन चुनावों में सग़ीर साहब ने पूरे प्रदेश का दौरा किया और बुलंदशहर से लेकर बलिया तक जनता पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में काम किया। लेकिन इन चुनावों में उत्तर प्रदेश में जनता पार्टी को कोई सफ़लता नहीं मिली और ख़ुद पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर बलिया से चुनाव हार गए।

 

 

 

कई लोगों का मानना है कि सग़ीर साहब जिस खूबसूरती और बारीकी के साथ राजनीति करते हैं उसकी कोई दूसरी मिसाल मिलना शायद संभव नहीं है, लेकिन अकेले सुमन जी ऐसे व्यक्ति हैं जो सग़ीर साहब को समझ लिए और अपनी बेबाकी के साथ उसका जवाब भी दे दिया। सग़ीर साहब को राजनीतिक रूप से एक नुकसान मरहूम रियासत हुसैन साहब के न रहने से भी हुआ, जिनका 1986 में इंतकाल हो गया था। हालांकि 1989 में हुए चुनावों में जनता पार्टी, जो जनता दल में विलीन हो चुकी थी, सत्ताधारी पार्टी बनकर उभरी। लेकिन सग़ीर साहब के साथ एक बार फिर वही नाइंसाफ़ी हुई जो 1977 में जनता पार्टी बनने के बाद हुई थी।

 

 

 

लगभग 60 वर्षों के अपने सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में जितनी निराशा, नाउम्मीदी और विफ़लताएं सग़ीर साहब को मिली, शायद कोई दूसरा व्यक्ति होता तो उसे बर्दाश्त न कर पाता। लेकिन ये भी सग़ीर साहब की शख्सियत का ही एक ख़ास पहलू था कि उन्होंने इन सबको भी ख़ुशी-ख़ुशी क़बूल किया। हालांकि उनकी सेहत पर इसका बहुत असर हुआ, लेकिन इसकी ख़बर उन्होंने अपने किसी क़रीबी को भी नहीं होने दी। सग़ीर साहब की शख़्सियत का एक दूसरा पहलू ये है कि वो बहुत ही ख़ुद्दार इनसान थे और अपने आत्म-सम्मान के साथ किसी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं हैं चाहे उसके लिए उन्हें कितनी ही तकलीफ़ें बर्दाश्त क्यों न करनी पड़े।  सग़ीर साहब के जिस तरह के राजनीतिक संपर्क रहे उसमें वे काफ़ी दौलत, पैसा, संपत्ति बना सकते थे, लेकिन ये चीज़ें सग़ीर साहब के लिए बेमानी रहीं। अपनी शर्तों पर, अपने आराम के साथ राजनीति करना और दोस्ती निभाना सग़ीर साहब की शख़्सियत का एक ख़ास पहलू है। कई बार तो ऐसा भी हुआ जब उन्हें ये चेतावनी भी दी गई कि अगर उन्होंने अमुक-अमुक व्यक्ति से ताल्लुक़ रखा तो उन्हें नुकसान होगा, बावज़ूद इसके उन्होंने अपने उसूलों से कोई समझौता नहीं किया। सग़ीर साहब ने समाजवाद को न केवल एक राजनीतिक विचारधार के रूप में स्वीकार किया बल्कि आचरण में भी वे ज़िंदगी भर समाजवादी रहे और उन पर कभी कोई आरोप नहीं लग सका। मैं समझता हूं ये सग़ीर साहब की सबसे बड़ी पूंजी है। उन्होंने समाज से न्यूनतम लिया और अधिकतम दिया। ऐसे महान समाजवादी को मैं सलाम करता हूं।

 

सग़ीर साहब मेरे  मरहूम वालिद के दोस्त और साथी रहे हैं और मुझे भी अपना दोस्त मानते रहे। मैंने  पहली बार  उन्हें 1978 देखा और जाना तो बहुत बाद में।मेरे  मरहूम वालिद कैप्टिन  अब्बास अली साहिब जिन चंद  लोगों का बेहद एहतराम करते थे और जिनसे उनका दिली  ताल्लुक़ था, सग़ीर साहब उनमें से एक थे और मुझे याद नहीं के इन दोनों के दरम्यान कभी कोई तल्ख़ी हुई हो।

जनसत्ता एक्सप्रेस एक स्वतंत्र मंच है। जहां आपको अपनी बात रखने की, अपने विचार रखने की, अपने जज्बात रखने की खुली छूट है। पर एक बात यहां साफ कर दें कि पत्रकारिता के भी कुछ मूलभूल सिद्धांत हैं जिससे परे हम लोग भी नहीं। पर आप जनसत्ता एक्सप्रेस के साथ किसी भी रूप में जुड़ना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। हम या आपको उतना ही आदर देंगे, सम्मान देंगे जितना अपने सहकर्मी को। इसलिए आप अपने क्षेत्र की खबरें, वीडियो हमें शेयर करें। हम उन्हें जनसत्ता एक्सप्रेस पर प्रकाशित करेंगे। इसके लिए आप jansattaexp@gmail.com का उपयोग कर सकते हैं। या फिर हमें आप whatsup भी 7678313774 पर कर सकते हैं। फोन तो आप कर ही सकते हैं। इसलिए एक नेक काम के लिए, पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए हमारे साथ, हमारी टीम का हिस्सा बनिए और स्वतंत्र पत्रकार, फोटोग्राफर, स्तंभकार के रूप में अपने अंदर के पत्रकार को जिंदा रखिए। हमारी टीम तो आपके साथ है ही।

राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस

ट्रेंडिंग